लखनऊ, 2 अगस्त 2026: ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) द्वारा रविवार को यूपी प्रेस क्लब, लखनऊ में “पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर का ऐतिहासिक आंदोलन और उसके विस्तार का रास्ता” विषय पर एक जनसभा आयोजित की गई। सभा में छात्रों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने जंतर-मंतर आंदोलन के राजनीतिक महत्व तथा पेपर लीक, परीक्षा संबंधी अनियमितताओं और बेरोजगारी के खिलाफ संघर्ष को देशभर के विश्वविद्यालयों, कस्बों और गांवों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर चर्चा की।
सभा को संबोधित करते हुए आइसा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मनीष कुमार ने जंतर-मंतर पर 23 दिनों तक चली भूख हड़ताल में अपनी भागीदारी को याद किया।
> “मैं आइसा के उन कार्यकर्ताओं में शामिल था, जो जंतर-मंतर पर 23 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे। हमने यह कठिन संघर्ष इसलिए किया क्योंकि पेपर लीक केवल प्रशासनिक विफलता की कुछ अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। यह लाखों छात्रों और प्रतियोगी अभ्यर्थियों की मेहनत, सम्मान और भविष्य पर हमला है। सरकार ने आंदोलन की अनदेखी कर उसे थकाने की कोशिश की, लेकिन देशभर के छात्रों और नागरिकों से मिले समर्थन ने इसे जीवित रखा। जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह संघर्ष अब प्रत्येक विश्वविद्यालय, कस्बे और गांव तक पहुंचना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले पेपर लीक और भर्ती घोटालों के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। उन्होंने संगठित पेपर लीक गिरोहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, पारदर्शी और सुरक्षित परीक्षा व्यवस्था, समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया तथा 20 जुलाई को हुए पुलिस दमन के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की।
आइसा के संस्थापक अध्यक्ष तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष लाल बहादुर सिंह ने वर्तमान संघर्ष को लोकतांत्रिक छात्र आंदोलनों के व्यापक इतिहास के संदर्भ में रखा।
> “छात्र आंदोलन तभी स्थायी सामाजिक बदलाव की ताकत बनते हैं, जब वे अपनी तात्कालिक समस्याओं को व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों से जोड़ते हैं। जंतर-मंतर आंदोलन ने पेपर लीक के सवाल को बेरोजगारी, शिक्षा के बाजारीकरण और संस्थागत जवाबदेही के पतन से जोड़ा है। इसके अगले चरण में छात्रों, प्रतियोगी अभ्यर्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और आम नागरिकों की व्यापक लोकतांत्रिक एकता का निर्माण करना होगा। यह संघर्ष किसी एक धरनास्थल तक सीमित नहीं रह सकता। इसे शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक भविष्य के अधिकार के लिए एक देशव्यापी आंदोलन बनना होगा।”
डॉ. माद्री काकोटी, जिन्हें डॉ. मेडुसा के नाम से भी जाना जाता है, ने आंदोलन द्वारा विकसित नई राजनीतिक और सांस्कृतिक भाषा पर अपनी बात रखी।
> “जंतर-मंतर आंदोलन ने युवाओं के रोजमर्रा के अनुभवों, आक्रोश और रचनात्मकता से जुड़ी विरोध की एक नई भाषा विकसित की। सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, लाइव प्रसारण, व्यंग्य, मीम, गीत और पोस्टरों के माध्यम से आंदोलन ने देशभर के छात्रों और प्रतियोगी अभ्यर्थियों से सीधा संवाद स्थापित किया। इसने सरकारी दावों को चुनौती दी और पारंपरिक मीडिया के एक बड़े हिस्से की चुप्पी को तोड़ा। सोशल मीडिया ने आंदोलन की पहुंच का विस्तार किया, जबकि जंतर-मंतर पर लगातार बनी भौतिक उपस्थिति ने उस डिजिटल अभिव्यक्ति को वास्तविक राजनीतिक ताकत प्रदान की।”
सभा ने लखनऊ विश्वविद्यालय में 56 दिनों तक चले आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्रों, विशेष रूप से प्रिंस प्रकाश, प्रेम प्रकाश और हर्षित शुक्ला, के प्रति एकजुटता व्यक्त की। वक्ताओं ने उनके संघर्ष और दृढ़ता को रेखांकित करते हुए कहा कि छात्रों के संगठित होने, विरोध करने और अपनी मांगें उठाने के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।
जनसभा ने उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों और बेरोजगार युवाओं के बीच इस आंदोलन का विस्तार करने का संकल्प लिया। सभा ने पेपर लीक, भर्ती संबंधी अनियमितताओं और राजनीतिक जवाबदेही स्वीकार करने से सरकार के इनकार के खिलाफ समन्वित अभियानों, जनसभाओं और व्यापक लोकतांत्रिक लामबंदी का आह्वान किया।
वक्ताओं ने कहा कि जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक पारदर्शी और जवाबदेह परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की जाती तथा छात्रों और प्रतियोगी अभ्यर्थियों की मांगों को पूरा नहीं किया जाता।
