कर्म ही मेरा धर्म, फल की चिंता नहीं; पद और प्रतिष्ठा से बड़ी है भारत की सेवा: पीएम मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘विकसित भारत संकल्प सभा’ को संबोधित करते हुए देशसेवा, सुशासन और अपने 25 वर्षों के संवैधानिक सफर को लेकर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि उनके लिए पद और प्रतिष्ठा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण देशवासियों की सेवा करना है।

संबोधन के मुख्य बिंदु:

  • निष्काम सेवा और कर्तव्य भाव: पीएम मोदी ने गीता के संदेश को याद दिलाते हुए कहा, “मेरा कर्तव्य ही मेरा धर्म है और मुझे फल की चिंता नहीं है। पद, प्रतिष्ठा और सत्ता से बहुत ऊपर देश की सेवा का भाव है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि 25 वर्षों की सार्वजनिक सेवा का यह मार्ग केवल जनकल्याण को समर्पित रहा है।

  • 140 करोड़ देशवासी ही ताकत: उन्होंने कहा कि आज का भारत अपनी नियति का निर्माण खुद कर रहा है। देश के पास चुनौतियां हैं तो 140 करोड़ समाधान भी मौजूद हैं।

  • 2047 तक विकसित भारत का संकल्प: प्रधानमंत्री ने भरोसा जताया कि वर्ष 2047 तक भारत एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनकर उभरेगा। जब 100 साल पहले 40 करोड़ से कम आबादी वाले देश ने आजादी की नींव रखी थी, तो आज 140 करोड़ देशवासी मिलकर विकसित भारत के सपने को अवश्य साकार करेंगे।

  • विरासत और सुशासन का मॉडल: उन्होंने बताया कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहने से लेकर देश के प्रधानमंत्री पद तक, उनकी सरकार का एकमात्र ध्येय अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का विकास और सुशासन रहा है।

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