ईश्वर को केवल तर्क के माध्यम से जानना संभव नहीं है – स्वामी मुक्तिनाथानंद

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

लखनऊ , श्रीरामकृष्ण वचनामृत पर अपने रविवारीय साप्ताहिक प्रवचन में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य केवल संसार को जानना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप और परम सत्य का अनुभव करना है। धर्म का उद्देश्य भी केवल पुस्तकों को पढ़ना, तर्क करना या सिद्धांतों पर चर्चा करना नहीं है। धर्म तब पूर्ण होता है, जब सत्य हमारे जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है। इसी को ज्ञान से विज्ञान की यात्रा कहा जा सकता है।

स्वामी जी ने बताया कि ईश्वर को केवल तर्क और बुद्धि के माध्यम से जानना संभव नहीं है। कठोपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है—

“नैषा तर्केण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि
त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा॥”
— कठोपनिषद् 1.2.9*

अर्थात् परम सत्य की यह अनुभूति केवल तर्क के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। उसके लिए आत्मानुभूति और योग्य मार्गदर्शन आवश्यक है। हमारी बुद्धि सीमित है, जबकि ईश्वर अनंत हैं। सीमित साधन से असीम को पूरी तरह पकड़ लेना संभव नहीं है। तर्क हमें सत्य की दिशा में ले जा सकता है, लेकिन अंतिम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव तर्क से आगे की अवस्था है।

स्वामी विवेकानंद ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से कहा—“Religion is realization; not talk, not doctrine, nor theories…” अर्थात धर्म केवल बातचीत, सिद्धांत या विचार नहीं, बल्कि अनुभूति है। धर्म का वास्तविक अर्थ है—सत्य को अपने जीवन में अनुभव करना। केवल यह जान लेना कि ईश्वर हैं, ज्ञान है; लेकिन ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेना विज्ञान है।

श्रीमद्भगवद्गीता भी ज्ञान और विज्ञान के इसी संबंध को स्पष्ट करती है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

“ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता 7.2

अर्थात् भगवान कहते हैं कि वे अर्जुन को ज्ञान के साथ विज्ञान भी पूर्ण रूप से बताएँगे; जिसे जान लेने के बाद संसार में और कुछ जानना शेष नहीं रहता। यहाँ ज्ञान केवल बौद्धिक जानकारी नहीं है, बल्कि विज्ञान उस ज्ञान की अनुभूति और जीवन में उसकी सच्ची उपलब्धि है।

स्वामी जी ने समझाया कि इसलिए हमारे जीवन का लक्ष्य केवल ज्ञानी बनना नहीं, बल्कि विज्ञानी बनना होना चाहिए। ज्ञान और अज्ञान दोनों के पार जाने की बात भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में कही गई है। गुरु वशिष्ठ जैसे महान ज्ञानी को भी पुत्र-वियोग में शोक करते देखकर लक्ष्मण ने श्रीराम के सामने प्रश्न रखा कि इतने बड़े ज्ञानी को भी शोक कैसे हो सकता है? इस प्रसंग के माध्यम से यह समझाया जाता है कि केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जब तक सत्य जीवन की प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं बनता, तब तक मनुष्य ज्ञान और अज्ञान के द्वंद्व से पूरी तरह मुक्त नहीं होता। ज्ञान का परिपक्व रूप विज्ञान है।

श्रीरामकृष्ण परमहंस ने ज्ञान और विज्ञान के अंतर को बहुत सरल उदाहरण से समझाया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति दूध के बारे में जानता है, वह ज्ञानी है; लेकिन जो दूध पीकर उसकी शक्ति को अपने जीवन में अनुभव करता है, वह विज्ञानी है। अर्थात् केवल किसी वस्तु के बारे में जानकारी होना और उस सत्य को प्रत्यक्ष अनुभव करना—इन दोनों में बहुत अंतर है। इसलिए आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य केवल ज्ञान संग्रह करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को अनुभव में बदलना है।

स्वामी जी ने कहा अब प्रश्न उठता है कि हम कैसे पहचानें कि कोई व्यक्ति विज्ञानी है? इसका उत्तर उसके बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उसके जीवन की अवस्था में मिलता है। विज्ञानी व्यक्ति भीतर से पूर्णता और संतोष का अनुभव करता है। उसकी इच्छाओं की बेचैनी कम होती जाती है और उसे किसी बाहरी उपलब्धि में अंतिम संतुष्टि खोजने की आवश्यकता नहीं रहती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विपरीत परिस्थितियाँ भी उसके आंतरिक संतुलन को आसानी से विचलित नहीं कर पातीं।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

“यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता 6.22

अर्थात् जिस परम लाभ को प्राप्त करके मनुष्य उससे बड़ा कोई दूसरा लाभ नहीं मानता और जिसमें स्थित होकर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता, वही वास्तविक आध्यात्मिक उपलब्धि है।

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि इस प्रकार ज्ञान हमें सत्य का परिचय देता है और विज्ञान उस सत्य को जीवन का अनुभव बना देता है। शास्त्र हमें दिशा देते हैं, तर्क हमें विचार करने की क्षमता देता है, गुरु हमें मार्ग दिखाते हैं, लेकिन अंतिम यात्रा हमें स्वयं करनी होती है। ईश्वर के विषय में सुनना, पढ़ना और विचार करना आवश्यक है, परंतु इन सबका अंतिम उद्देश्य प्रत्यक्ष अनुभूति है। इसलिए मनुष्य को केवल ज्ञानी बनने की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि विज्ञानी बनने का प्रयास करना चाहिए—ऐसा विज्ञानी जिसके भीतर पूर्ण संतोष हो, जो परिस्थितियों से विचलित न हो और जिसके लिए ईश्वर केवल एक विचार या सिद्धांत न रहकर जीवन का प्रत्यक्ष सत्य बन जाए। यही ज्ञान की पूर्णता और मानव जीवन की सार्थकता है।

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