आइसा के 36 वर्ष: भगत सिंह और अंबेडकर के रास्ते पर लोकतांत्रिक-क्रांतिकारी छात्र आंदोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

लखनऊ, 9 अगस्त 2026 ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के स्थापना दिवस के अवसर पर आज आइसा कार्यालय, निशातगंज, लखनऊ में “आइसा आंदोलन के 36 साल और समकालीन चुनौतियां” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कॉमरेड लाल बहादुर सिंह, संस्थापक अध्यक्ष, आइसा रहे। कार्यक्रम में छात्रों, युवाओं और संगठन के कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की तथा आइसा के 36 वर्षों के संघर्ष और वर्तमान दौर की चुनौतियों पर चर्चा हुई।

आइसा की स्थापना 9 अगस्त 1990 को क्रांति दिवस के अवसर पर इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में देशभर के विभिन्न वामपंथी छात्र संगठनों के विलय से हुई थी। स्थापना के समय से ही आइसा ने शिक्षा के लोकतंत्रीकरण, छात्र अधिकारों, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष को अपने आंदोलन के केंद्र में रखा है। आज आइसा की संगठनात्मक उपस्थिति दिल्ली, चंडीगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, असम, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा सहित देश के विभिन्न हिस्सों में है।

मुख्य वक्ता कॉमरेड लाल बहादुर सिंह ने कहा कि “1990 में आइसा का गठन क्रांतिकारी और लोकतांत्रिक छात्र आंदोलन के लिए एक लंबे समय से महसूस की जा रही आवश्यकता का परिणाम था।” उन्होंने कहा कि स्थापना के बाद से ही आइसा ने कुमाऊं विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बीएचयू जैसे परिसरों में सांप्रदायिक राजनीति को चुनौती दी और जेएनयू छात्रसंघ में लाल झंडे के नेतृत्व में छात्र आंदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि पिछले 36 वर्षों में आइसा फीस वृद्धि, शिक्षा के बाजारीकरण, निजीकरण, छात्र अधिकारों पर हमले और परिसर में लोकतांत्रिक स्पेस के संकुचन के खिलाफ लगातार संघर्ष करता रहा है।

उन्होंने कहा कि आइसा ने शिक्षा और रोजगार को मूलभूत अधिकार बनाने की मांग को लगातार उठाया है और ज्ञान आयोग की सिफारिशों, शिक्षा के निजीकरण तथा कैंपस लोकतंत्र पर हमलों का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि मंडल के दौर में सामाजिक न्याय और आरक्षण के सवाल पर आइसा ने वंचित तबकों की भागीदारी के पक्ष में खड़े होकर छात्र आंदोलन को जाति-विरोधी और वर्ग-संघर्ष की व्यापक राजनीति से जोड़ा।

कॉमरेड लाल बहादुर सिंह ने कॉमरेड चंद्रशेखर के बलिदान को याद करते हुए कहा कि छात्र अधिकारों और लोकतांत्रिक राजनीति के लिए संघर्ष करते हुए आइसा के प्रमुख नेता और दो बार जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर की शहादत संगठन की क्रांतिकारी विरासत का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि आइसा भगत सिंह और चंद्रशेखर की विरासत को आगे बढ़ाने तथा समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन के लक्ष्य के लिए संघर्ष जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

परिचर्चा में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, फीस वृद्धि, सीटों में कटौती, बेरोजगारी, जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिक राजनीति और कैंपस लोकतंत्र पर बढ़ते हमलों को वर्तमान दौर की प्रमुख चुनौतियों के रूप में चिन्हित किया गया। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को बाजार के हवाले करने और सार्वजनिक शिक्षा को कमजोर करने की प्रक्रिया का सबसे अधिक असर दलित, बहुजन, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला, क्वीयर और प्रथम पीढ़ी के छात्रों पर पड़ता है। ऐसे दौर में छात्र आंदोलन को शिक्षा के अधिकार, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवालों को एक साथ जोड़ना होगा।

परिचर्चा में सांप्रदायिक फासीवाद और राजनीति के सांप्रदायीकरण के खिलाफ संघर्ष को भी छात्र आंदोलन की केंद्रीय जिम्मेदारी बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि धर्म को राजनीति और शासन से अलग रखते हुए धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना आज पहले से अधिक आवश्यक है। आइसा ने हमेशा सांप्रदायिकता, जातिवाद, लैंगिक भेदभाव और राज्य दमन के खिलाफ लोकतांत्रिक प्रतिरोध को मजबूत करने की दिशा में काम किया है।

आइसा ने शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के लिए फीस वृद्धि और निजीकरण के खिलाफ संघर्ष, सार्वजनिक शिक्षा में निवेश बढ़ाने, सभी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और बेहतर बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करने, सामाजिक रूप से वंचित समूहों के आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा विश्वविद्यालयों में नियमित और लोकतांत्रिक छात्रसंघ चुनाव सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

स्थापना दिवस के अवसर पर संगठन ने संकल्प लिया कि आइसा आने वाले समय में भगत सिंह, डॉ. आंबेडकर और कॉमरेड चंद्रशेखर की विरासत को आगे बढ़ाते हुए शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की लड़ाई को और व्यापक करेगा। कार्यक्रम में कहा गया कि आइसा की 36 वर्षों की यात्रा केवल संगठन के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि भारत के छात्र आंदोलन को लोकतांत्रिक, सामाजिक न्याय आधारित और जनपक्षधर दिशा देने की निरंतर प्रक्रिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *