“Vedic Cosmology and Evolution of Brahmanic Iconography” विषय पर व्याख्यान आयोजित, वैदिक विश्व-दृष्टि एवं ब्राह्मणीय प्रतिमा-विज्ञान के विकास पर हुआ सारगर्भित विमर्श

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

लखनऊ, 31 जुलाई, 2026।संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के अंतर्गत राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” (26 जुलाई से 07 अगस्त, 2026) के अंतर्गत आज “Vedic Cosmology and Evolution of Brahmanic Iconography” विषय पर एक विशिष्ट अकादमिक व्याख्यान का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में भारतीय कला, संस्कृति, धर्म, पुरातत्व, इतिहास एवं प्रतिमा-विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. आनंद वर्धन, स्कूल ऑफ हेरिटेज, रिसर्च एंड मैनेजमेंट एवं उप-संकाय प्रमुख (एकेडमिक अफेयर्स), डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, नई दिल्ली रहे। अपने व्याख्यान में उन्होंने वैदिक साहित्य में वर्णित ब्रह्मांडीय अवधारणाओं तथा भारतीय धार्मिक प्रतीकों एवं देव-प्रतिमाओं के विकास के मध्य संबंधों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वैदिक विश्व-दृष्टि केवल दार्शनिक चिंतन तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने भारतीय कला, स्थापत्य और प्रतिमा-विज्ञान की संरचना को भी गहराई से प्रभावित किया।

प्रो. आनंद वर्धन ने बताया कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद में वर्णित ब्रह्मांडीय अवधारणाएँ—जैसे ऋत, पुरुष, हिरण्यगर्भ, विश्वरूप तथा सृष्टि की उत्पत्ति—आगे चलकर ब्राह्मणीय धार्मिक प्रतीकों एवं मूर्तिकला के महत्वपूर्ण आधार बने। उन्होंने विभिन्न कालखंडों की प्रतिमाओं, मंदिरों तथा शिल्प परंपराओं के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि किस प्रकार वैदिक विचारधारा ने ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवताओं की मूर्त रूप में अभिव्यक्ति को आकार प्रदान किया।कार्यक्रम की विशिष्ट वक्ता प्रो. सुष्मिता बसु मजूमदार, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, कोलकाता विश्वविद्यालय, कोलकाता ने अपने व्याख्यान में ब्राह्मणीय प्रतिमा-विज्ञान के विकासक्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय मूर्तिकला केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि दार्शनिक विचारों, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक संरचनाओं का भी दर्पण है।

उन्होंने प्रारंभिक प्रतीकात्मक निरूपण से लेकर विकसित देव-प्रतिमाओं तक की यात्रा का विश्लेषण प्रस्तुत किया तथा बताया कि भारतीय कलाकारों ने अमूर्त वैदिक अवधारणाओं को किस प्रकार मूर्त एवं दृश्य स्वरूप प्रदान किया।इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय संस्कृति, कला और इतिहास के ऐसे मनीषी थे जिन्होंने भारतीय परंपराओं के अध्ययन को नई दृष्टि प्रदान की। उनकी स्मृति में आयोजित यह व्याख्यानमाला भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विरासत तथा अकादमिक विमर्श को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी खेमका, सहायक निदेशक (सज्जा कला), राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया।

उन्होंने विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए वक्ताओं का परिचय कराया तथा कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डाला।व्याख्यान के उपरांत आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान, ब्राह्मणीय प्रतिमा-विज्ञान, धार्मिक प्रतीकों की उत्पत्ति तथा भारतीय कला परंपराओं से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे।

वक्ताओं ने विद्वत्तापूर्ण एवं सरल शैली में उनके उत्तर दिए, जिससे प्रतिभागियों को विषय की गहन समझ प्राप्त हुई।कार्यक्रम ज्ञानवर्धक एवं चिंतनपरक रहा। उपस्थित विद्वानों एवं विद्यार्थियों ने इसे भारतीय सांस्कृतिक अध्ययन, प्रतिमा-विज्ञान तथा वैदिक परंपराओं की समझ को समृद्ध करने वाला एक महत्वपूर्ण अकादमिक आयोजन बताया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *