डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत “सील एंड सीलिंग” विषय पर व्याख्यान आयोजित

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

लखनऊ, 29 जुलाई, 2026। राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला (26 जुलाई से 07 अगस्त, 2026) के अंतर्गत आज दिनांक 29 जुलाई, 2026 को “सील एंड सीलिंग” विषय पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व, कला एवं संस्कृति के अध्येताओं, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संग्रहालय प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. के. के. थपल्याल, पूर्व विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय रहे। भारतीय अभिलेखों, मुद्राशास्त्र एवं पुरातात्त्विक स्रोतों के प्रख्यात विद्वान प्रो. थपल्याल ने अपने व्याख्यान में प्राचीन भारत में मुहरों (Seals) एवं मुद्राओं (Sealings) की परंपरा, उनके विकास, स्वरूप, उपयोगिता तथा ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा कि मुहरें केवल प्रशासनिक अथवा औपचारिक प्रयोजनों की वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि वे तत्कालीन समाज, शासन व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों, धार्मिक संस्थानों तथा सांस्कृतिक परंपराओं के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। पुरातात्त्विक उत्खननों से प्राप्त मुहरें और मुद्राएं इतिहास लेखन के लिए अत्यंत विश्वसनीय स्रोत मानी जाती हैं, क्योंकि इनके माध्यम से तत्कालीन राजनीतिक संरचना, व्यापारिक संबंधों और संस्थागत व्यवस्थाओं की जानकारी प्राप्त होती है।प्रो. थपल्याल ने विशेष रूप से राजघाट से प्राप्त मिट्टी की मुद्राओं का उल्लेख करते हुए बताया कि ये मुद्राएं प्राचीन नगर प्रशासन, व्यापारिक गतिविधियों, धार्मिक संस्थानों तथा शैक्षिक केंद्रों के संगठनात्मक स्वरूप को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उन्होंने कहा कि राजघाट से प्राप्त अनेक मुद्राओं पर अंकित अभिलेख, प्रतीक एवं चिह्न तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। इन मुद्राओं का अध्ययन हमें उस काल की प्रशासनिक प्रणाली, दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया तथा संस्थागत कार्यप्रणाली के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।व्याख्यान के दौरान उन्होंने सिंधु सभ्यता की मुहरों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि ये मुहरें विश्व की सर्वाधिक विकसित प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से एक की उन्नत सांस्कृतिक एवं आर्थिक संरचना का परिचय देती हैं। उन्होंने बताया कि स्टियाटाइट से निर्मित इन मुहरों पर अंकित एकश्रृंगी पशु, वृषभ, हाथी तथा अन्य पशु आकृतियां केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं थीं, बल्कि वे पहचान, स्वामित्व एवं व्यापारिक नियंत्रण से भी संबंधित थीं। इन पर अंकित लिपि आज भी शोध का विषय बनी हुई है और उसके पूर्ण पाठ के अभाव में भी ये मुहरें उस सभ्यता के अध्ययन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं।उन्होंने कहा कि पुरातात्त्विक सामग्री के सूक्ष्म अध्ययन से इतिहास के अनेक ऐसे पक्ष सामने आते हैं, जिनका उल्लेख साहित्यिक स्रोतों में नहीं मिलता।स्वागत उद्बोधन डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला एवं पुरातत्व के ऐसे महान विद्वान थे, जिनके कार्य आज भी शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनके सम्मान में आयोजित यह व्याख्यानमाला भारतीय सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों को समझने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी खेमका, सहायक निदेशक, सज्जा कला, राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया। उन्होंने विषय की भूमिका प्रस्तुत करते हुए वक्ता के शैक्षणिक एवं शोध योगदान का परिचय दिया तथा व्याख्यानमाला की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *