संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों को लेकर भारत ने एक बार फिर मुखर अंदाज में अपनी बात रखी है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने महासभा में चर्चा के दौरान ‘डी फैक्टो वीटो’ (अप्रत्यक्ष या छिपे हुए वीटो) की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वीटो अधिकार का नहीं, बल्कि वैश्विक शांति के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने वाला माध्यम होना चाहिए।
‘आम सहमति’ की आड़ में प्रक्रिया अटकाने वाले देशों पर निशाना
भारतीय प्रतिनिधि ने बताया कि सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए चल रही ‘इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स’ (IGN) प्रक्रिया के तहत कुछ देश ‘आम सहमति’ (Consensus) की आड़ में ‘डी फैक्टो वीटो’ का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके जरिए वे बातचीत और सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इटली के नेतृत्व वाले ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (UfC) समूह जैसे कुछ देश प्रक्रिया संबंधी पैंतरे अपनाकर आईजीएन को किसी भी ठोस नतीजे या मसौदे तक पहुँचने से बाधित कर रहे हैं, जिससे 17 दौर की बातचीत के बाद भी कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आ पाया है।
गुप्त और अघोषित वीटो का मुद्दा
पी. हरीश ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर में मान्यता न होने के बावजूद, कई बार अप्रत्यक्ष या गुप्त वीटो का इस्तेमाल किया जाता है। अध्यक्षीय बयानों, प्रेस बयानों और प्रतिबंध समितियों के फैसलों में ‘अलिखित नियमों’ की आड़ में कोई भी एक सदस्य प्रस्तावों को रोक देता है, जिसके लिए उसे कोई कारण भी नहीं बताना पड़ता।
उन्होंने चीन द्वारा वैश्विक आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्तावों को इस तरह की गुप्त बैठकों और तरीकों से रोके जाने की ओर भी इशारा किया।
सुरक्षा परिषद के विस्तार और सुधार पर जोर
भारत ने दो टूक शब्दों में कहा कि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए केवल वीटो के प्रबंधन से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसके लिए परिषद का विस्तार करना और नए स्थायी सदस्यों को शामिल करना बेहद जरूरी है।
भारत ने इस बात पर भी जोर दिया कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए और इसमें किसी भी प्रकार की ‘सेकंड क्लास’ (दूसरे दर्जे) की श्रेणियां या भेदभावपूर्ण व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है।
