बृहस्पतिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि* मनुष्य का जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उसके भीतर एक ऐसी चेतना विद्यमान है, जो उसे परम सत्य और ईश्वर के अनुभव की ओर ले जा सकती है।श्रीरामकृष्ण परमहंस ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए मन का शुद्ध और विषय-वासनाओं से मुक्त होना आवश्यक है। गहन ध्यान और आध्यात्मिक उन्नति का आधार वैराग्य तथा निर्मल मन है। *स्वामी जी ने बताया कि* श्रीरामकृष्ण परमहंस अपने प्रिय शिष्य नरेंद्रनाथ (बाद में स्वामी विवेकानंद) का उदाहरण देते थे। एक बार संगीत सुनते ही नरेंद्र गहरे ध्यान में लीन हो गए। श्रीरामकृष्ण ने इसका कारण बताते हुए कहा कि नरेंद्र का मन सांसारिक इच्छाओं और विषय-बुद्धि से दूषित नहीं था। जब मन पर लोभ, मोह, अहंकार और भोग की छाप नहीं होती, तब वह सहज ही ईश्वर की ओर आकर्षित होता है। इसके विपरीत, जो मन निरंतर संसार की चिंताओं और इच्छाओं में उलझा रहता है, उसके लिए ध्यान की गहराई तक पहुँचना कठिन हो जाता है। इसलिए वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि विषयों के प्रति अनावश्यक आसक्ति से मुक्त होना है। *स्वामी जी ने बताया कि भारतीय दर्शन मन की चार अवस्थाओं का वर्णन करता है। पहली अवस्था जाग्रत है*, जिसमें मनुष्य इंद्रियों के माध्यम से संसार का अनुभव करता है। *दूसरी अवस्था स्वप्न है*, जहाँ मन अपने संस्कारों और कल्पनाओं के आधार पर अनुभव करता है। *तीसरी अवस्था सुषुप्ति है*, अर्थात गहरी नींद, जिसमें मन शांत रहता है, परंतु ज्ञान का प्रकाश प्रकट नहीं होता। *चौथी और सर्वोच्च अवस्था तुरीय है*। तुरीय वह दिव्य चेतना है, जहाँ मन पूर्णतः शांत, निर्मल और ईश्वर के ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है। यही अवस्था आत्म-साक्षात्कार और परम आनंद की स्थिति मानी जाती है। *श्रीरामकृष्ण ने मन को समझाने के लिए एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया*। उन्होंने कहा कि मन एक मिट्टी के पात्र के समान है। यदि पात्र नया और स्वच्छ हो, तो उसमें रखा दूध आसानी से दही बन जाता है। उसी प्रकार यदि मन अभी तक विषय-वासनाओं से अधिक प्रभावित नहीं हुआ है, तो उसमें आध्यात्मिक संस्कार शीघ्र स्थापित हो जाते हैं। लेकिन यदि पात्र पहले से गंदा हो, तो उसमें रखा दूध भी खराब हो सकता है। इसी प्रकार विषय-वासना, अहंकार और स्वार्थ से भरा मन ईश्वर की अनुभूति में बाधा बनता है। इसलिए मन को शुद्ध करना आध्यात्मिक जीवन की पहली आवश्यकता है। विशेष रूप से युवावस्था जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय है। इसी अवस्था में मन को सही दिशा दी जाए, तो आध्यात्मिक प्रगति सरल हो जाती है। यदि आरंभ से ही मनुष्य सत्य, सेवा, भक्ति, ध्यान और सदाचार का अभ्यास करे, तो उसका मन संसार में रहते हुए भी ईश्वर की ओर उन्मुख रहता है। बाद में जब जीवन अनेक जिम्मेदारियों और इच्छाओं से भर जाता है, तब मन को एकाग्र करना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है। *निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि* यह शिक्षा हमें बताती है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल ज्ञान या तर्क से नहीं, बल्कि शुद्ध मन, वैराग्य और नियमित साधना से संभव है। जब मन विषय-आसक्ति से मुक्त होकर ईश्वर की ओर मुड़ता है, तब ध्यान गहरा होता है और मनुष्य तुरीय जैसी उच्च चेतना का अनुभव कर सकता है। श्रीरामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद का जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि निर्मल मन ही ईश्वर का सर्वोत्तम मंदिर है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन को शुद्ध, शांत और ईश्वराभिमुख बनाने का प्रयास करना चाहिए। यही जीवन की वास्तविक सफलता और परम आनंद का मार्ग है।
