लखनऊ सोमवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस ने सरल उदाहरणों और सहज भाषा के माध्यम से गूढ़ आध्यात्मिक सत्य को जनसामान्य तक पहुंचाया। उनके सत्संगों में जीवन, ईश्वर, गुरु, भक्ति और आत्मज्ञान जैसे विषयों पर अत्यंत गहन विचार प्रस्तुत किए गए हैं। 23 अक्टूबर 1885 को डॉ. महेंद्र लाल सरकार के घर पर हुए एक संवाद में श्री रामकृष्ण ने अहंकार के नाश, गुरु की आवश्यकता तथा ज्ञान और भक्ति के संतुलन पर विशेष प्रकाश डाला। *स्वामी जी ने बताया कि श्री रामकृष्ण मनुष्य के आध्यात्मिक मार्ग की सबसे बड़ी बाधा उसका अहंकार मानते है*। जब तक व्यक्ति अपने ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव से मुक्त नहीं होता, तब तक वह ईश्वर का वास्तविक अनुभव नहीं कर सकता। इस सत्य को समझाने के लिए उन्होंने एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि *जैसे रूई से धागा बनाने के लिए ‘धुनिया’ की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य के भीतर बसे अहंकार को दूर करने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है।* बिना धुनिया के रूई सही रूप में तैयार नहीं हो सकती और बिना गुरु के मनुष्य का अंतःकरण भी शुद्ध नहीं हो पाता। गुरु ही वह मार्गदर्शक हैं जो साधक के अहंकार को समाप्त कर उसे ईश्वर के चरणों तक पहुंचाते हैं। डॉ. महेंद्र लाल सरकार ने भी इस उदाहरण को स्पष्ट करते हुए कहा कि गुरु वास्तव में वही धुनिया हैं, जो साधक के भीतर के विकारों और अहंकार को दूर कर उसके जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करते हैं। गुरु केवल ज्ञान देने वाले शिक्षक नहीं होते, बल्कि वे साधक के जीवन में परिवर्तन लाने वाले प्रेरणास्रोत होते हैं। उनके मार्गदर्शन से ही व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने और ईश्वर के निकट पहुंचने में समर्थ बनता है। *स्वामी जी ने आगे बताया कि इस संवाद का दूसरा महत्वपूर्ण विषय ज्ञान और भक्ति का समन्वय था।* श्री रामकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। यदि ज्ञान के साथ भक्ति का समावेश न हो, तो वह अधूरा रह जाता है। ज्ञान मनुष्य को बाहरी सत्य और विवेक का बोध कराता है, जबकि भक्ति उसके हृदय को प्रेम, समर्पण और करुणा से भर देती है। भक्ति वह शक्ति है जो साधक को ईश्वर के अंतरंग सान्निध्य तक पहुंचाती है। इसलिए ज्ञान और भक्ति को एक-दूसरे का पूरक माना गया है, न कि विरोधी। श्री रामकृष्ण का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। आधुनिक जीवन में मनुष्य उपलब्धियों, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों के कारण अहंकार में उलझ जाता है। परिणामस्वरूप उसके जीवन से शांति और संतोष दूर होने लगते हैं। ऐसे समय में गुरु का मार्गदर्शन व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करता है और उसे आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है। साथ ही, ज्ञान और भक्ति का संतुलन जीवन को केवल बौद्धिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से भी समृद्ध बनाता है। *निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए गुरु का मार्गदर्शन, अहंकार का त्याग तथा ज्ञान और भक्ति का संतुलित समन्वय अनिवार्य है*। जब साधक विनम्रता, श्रद्धा और प्रेम के साथ गुरु के बताए मार्ग पर चलता है, तब उसका जीवन आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित हो जाता है। श्री रामकृष्ण का यह संदेश केवल धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक, शांत और आनंदमय बनाने का एक कालजयी मार्गदर्शन है।
