लखनऊ। रामकृष्ण मठ, निराला नगर, लखनऊ में आज श्री श्री दुर्गा प्रतिमा के काठामो पूजन तथा श्री श्री जगन्नाथ देव की पावन रथयात्रा का उत्सव पारम्परिक विधि-विधान, वैदिक मंत्रोच्चार एवं भक्तिमय वातावरण में सम्पन्न हुआ। प्रातः 4ः30 बजे से रात्रि 9ः00 बजे तक चले इस धार्मिक अनुष्ठान का सीधा प्रसारण रामकृष्ण मठ, लखनऊ के आधिकारिक यूट्यूब चौनल ’’रामकृष्ण मठ लखनऊ’’ के माध्यम से किया गया, जिससे देश-विदेश में स्थित अनेक श्रद्धालुओं ने ऑनलाइन जुड़कर उत्सव का लाभ प्राप्त किया।

उत्सव का शुभारम्भ प्रातः 4ः30 बजे श्री श्री ठाकुर की मंगल आरती एवं प्रार्थना से हुआ। इसके उपरान्त प्रातः 6ः50 बजे स्वामी इष्टकृपानन्द जी के नेतृत्व में वैदिक मंत्रोच्चार, श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ तथा श्री जगन्नाथाष्टकम् का सामूहिक गायन सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी का ऑनलाइन सत्संग आयोजित हुआ।

प्रातः 8ः00 बजे मुख्य मंदिर में श्री श्री ठाकुर की पूजा सम्पन्न हुई। इसके बाद दुर्गा मण्डप में आगामी दुर्गा पूजा के लिए श्री श्री काठामो पूजा स्वामी कृष्णपदानन्दजी (देबांजन) के द्वारा शुभारम्भ हुआ। इस अवसर पर वैदिक सूक्तपाठ, नारायण सूक्तम् दुर्गा सूक्तम् एवं देवी सूक्तम् का सस्वर गायन तथा श्री महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम का सामूहिक भजन स्वामी इष्टकृवानन्दजी के नेतृत्व से किया गया। सुप्रसिद्ध भजन गायक डॉ. बीजू भगवती ने भक्तिमय भजनों की प्रस्तुति दी, जिसमें तबले पर श्री सुमित मल्लिक ने संगत की। प्रातः 10ः45 बजे उपस्थित श्रद्धालुओं ने त्रिदेवों को पुष्पांजलि अर्पित की तथा तत्पश्चात प्रसाद वितरण किया गया।

सायंकाल संध्या आरती के उपरान्त आयोजित विशेष प्रवचन में ’’रथयात्रा का आध्यात्मिक संदेश’’ विषय पर प्रवचन देते हुए रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी ने कहा कि रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा की ईश्वर की ओर यात्रा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि उपनिषदों में मानव शरीर को रथ, इन्द्रियों को उसके अश्व, मन को लगाम, बुद्धि को सारथि तथा आत्मा को रथ का स्वामी बताया गया है। जब मनुष्य विवेक एवं संयम के साथ अपने जीवन-रथ का संचालन करता है, तभी वह अपने वास्तविक लक्ष्य, अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है।
स्वामी जी ने कहा कि भगवान जगन्नाथ ‘‘दारुब्रह्म’’ के रूप में समस्त सृष्टि में व्याप्त परमब्रह्म के साकार स्वरूप हैं। रथ पर विराजमान भगवान के दर्शन का वास्तविक अर्थ अपने हृदय रूपी रथ में भगवान को प्रतिष्ठित करना है। रथ को खींचना केवल एक परम्परा नहीं, बल्कि यह समर्पण, सेवा और ईश्वर के प्रति दास्यभाव की अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भक्त को अपने जीवन से अहंकार, काम, क्रोध, लोभ तथा अन्य विकारों को दूर कर हृदय को भगवान के योग्य बनाना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि पुरी की रथयात्रा हमें यह भी सिखाती है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के समीप आते हैं। मंदिर की सीमाओं से बाहर निकलकर वे प्रत्येक व्यक्ति को अपने दर्शन एवं कृपा का अवसर प्रदान करते हैं। यह उत्सव हमें प्रेम, समानता, सेवा तथा सार्वभौमिक आध्यात्मिकता का संदेश देता है।
स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी ने श्री श्री माँ सारदा देवी के रथयात्रा प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि बाह्य दर्शन तभी सार्थक होता है जब मन वासनाओं से मुक्त होकर भगवान की ओर उन्मुख हो। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि रथयात्रा के इस पावन अवसर पर वे अपने अन्तःकरण को शुद्ध करने तथा आध्यात्मिक जीवन को दृढ़ बनाने का संकल्प ले।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं एवं भक्तों के मध्य प्रसाद वितरण किया गया तथा सभी ने भगवान श्री जगन्नाथ के चरणों में विश्व-शान्ति, मानव कल्याण एवं आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना की।
