नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल ‘संयम’ से करने और कोविड-युग जैसी सावधानी बरतने को कहा है. प्रधानमंत्री की तेल बचाने की सलाह के बाद केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट कर यह समझाया कि पीएम मोदी की सलाह को मानना अब देश के लिए क्यों जरूरी हो गया है और ईंधन की कीमत न बढ़ाने की वजह से कितना घाटा सरकार को झेलना पड़ रहा है. प्रधानमंत्री की अपील के बाद अब कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार पेट्रोल और डीजल के दाम में इजाफा कर सकती है. ऐसे में सवाल यह है कि कच्चा तेल महंगा होने से तेल कंपनियों को जो घाटा हो रहा है उसे पाटने के लिए सरकार को पेट्रोल और डीजल के दाम में कितना इजाफा करना होगा.
पीएम मोदी की अपील के बाद हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, गैस और एलपीजी की कीमतें आसमान छू रही हैं. तेल कंपनियां महंगे दाम पर कच्चा माल खरीद रही हैं, लेकिन आम जनता को महंगाई से बचाने के लिए वे पेट्रोल-डीजल और गैस को पुरानी या कम कीमतों पर बेच रही हैं. इससे सरकारी तेल कंपनियां को रोज 1,000 करोड़ का भारी नुकसान हो रहा है. चालू तिमाही में तेल कंपनियों का कुल घाटा 1,00,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है.
कितना बढ़ाना होगा पेट्रोल-डीजल का रेट
एक अनुमान के अनुसार, इस समय तेल कंपनियां पेट्रोल पर लगभग 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल लगभग 25 रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है. इसका मतलब है कि अगर सरकार पेट्रोल के दाम 18 लीटर और डीजल के रेट में 25 रुपये लीटर की बढ़ोतरी करे तो बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी तेल कंपनियों का घाटा जीरो होगा.
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने भी पिछले दिनों माना था किपश्चिम एशिया संकट के कारण कंपनियों पर गंभीर वित्तीय दबाव बना हुआ है. पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के अलावा, घरेलू उड़ानों के लिए इस्तेमाल होने वाले एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) यानी जेट फ्यूल की बिक्री पर भी कंपनियों को नुकसान हो रहा है.
एक्साइज ड्यूटी कटौती भी साबित हुई नाकाफी
केंद्र सरकार ने मार्च के अंत में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी. इस कटौती से सरकार को स्वयं हर महीने 14,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है. इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगी आग इतनी भीषण है कि यह टैक्स कटौती भी तेल कंपनियों के घाटे को कम करने में नाकाफी साबित हो रही है.
