नेपाल में कुदरत का तांडव: अब तक 626 की मौत, 2500 लापता; 320 भारतीयों की खोज जारी

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नई दिल्ली : हिमालयी देश नेपाल और चीन के तिब्बती सीमावर्ती क्षेत्रों में कुदरत का भयावह रूप देखने को मिला है। उच्च पर्वतीय क्षेत्र में एक विशाल ग्लेशियर के टूटने से भारी मात्रा में बर्फ, चट्टानें और मलबा नीचे बहने वाली लेंडे नदी में आ गिरा। इस प्राकृतिक रुकावट के अचानक फटने से भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में भयानक सैलाब आ गया, जिसने रास्ते में आने वाली तमाम बस्तियों, सड़कों, पुलों और बुनियादी ढांचों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

इस भीषण आपदा में अब तक 626 लोगों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 2,500 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल रेड क्रॉस के आंकड़ों के अनुसार 90 हजार से ज्यादा लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। आपदा का सबसे बुरा असर बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं पर पड़ा है। करीब 13 प्रमुख हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिनमें काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारी सुरंगों में फंस गए। अकेले अपर त्रिशूली-1 परियोजना से ही 576 लोग लापता बताए जा रहे हैं।

इस घटना में 320 भारतीय नागरिक और भारतीय मूल के 100 अन्य लोग लापता हैं, जिनसे संपर्क साधने का प्रयास जारी है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इनमें से करीब 100 भारतीय त्रिशूली प्रोजेक्ट स्थल पर फंसे हैं। राहत की बात यह है कि तिब्बत में मौजूद 400 भारतीय सुरक्षित हैं और सीमा क्षेत्र में फंसे 96 लोग नेपाल सुरक्षित पहुँच चुके हैं। भारत ने तुरंत कदम उठाते हुए नेपाल के लिए दो खेप राहत सामग्री भेजी है और 36 से अधिक टूटे पुलों की जगह बेली ब्रिज बनाने में तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है।

हालाँकि वर्तमान में नदियों का जलस्तर सामान्य है, लेकिन खतरा टला नहीं है। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि ऊपरी क्षेत्र में मलबे के कारण एक अस्थाई झील बन गई है जिसमें लगभग 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी जमा हो चुका है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने चेतावनी जारी की है कि यदि यह कृत्रिम बांध टूटा, तो निचले इलाकों में दोबारा तबाही मच सकती है। सेना के हजारों जवान और बचाव दल लगातार राहत कार्य में जुटे हैं।

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