लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सरगर्मी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रामपुर दौरे ने सियासी पारे को बढ़ा दिया है। इस दौरे के दौरान उन्होंने जेल में बंद पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद आजम खान से मुलाकात की। हालांकि, इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात को लेकर जहां एक तरफ राजनीतिक समीकरण साधे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तीखी बयानबाजी और विरोधियों के निशाने पर यह दौरा आ गया है। इसके साथ ही, प्रवर्तन निदेशालय (ED) के नए शिकंजे ने आजम खान की मुश्किलें और अधिक बढ़ा दी हैं।
रामपुर दौरे का शेड्यूल और मुलाकात
निर्धारित कार्यक्रम के तहत अखिलेश यादव ने जौहर यूनिवर्सिटी के हेलीपैड पर उतरकर रामपुर जिला जेल का रुख किया। जेल के भीतर दोनों नेताओं के बीच लगभग 45 मिनट तक बातचीत होने की संभावना रही। इसके बाद अखिलेश यादव ने जेल रोड स्थित आजम खान के आवास पहुंचकर उनके परिजनों से मुलाकात की और उन्हें ढांढस बंधाया। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य परिवार को राजनीतिक एकजुटता का संदेश देना था।
सियासी वार-पलटवार: ‘बहुत देर कर दी मेहरबान’
इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक गलियारों में जुबानी जंग छिड़ गई है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने तंज कसते हुए कहा कि लंबे समय बाद आजम खान की सुध लेना केवल आगामी चुनावों के मद्देनजर मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने की एक सियासी चाल है। उन्होंने दावा किया कि इस देरी के कारण स्थानीय स्तर पर अब आजम खान का पुराना सियासी प्रभाव कमजोर हो चुका है।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने सपा पर पलटवार करते हुए कहा कि पार्टी को जनता के बीच जाने से पहले 2012 से 2017 तक के अपने कार्यकाल का श्वेतपत्र जारी करना चाहिए, जिसमें कथित तौर पर भ्रष्टाचार और कुशासन का बोलबाला था।
ईडी के शिकंजे में फंसे आजम खान
राजनीतिक बयानों और मुलाकातों के बीच आजम खान के लिए कानूनी राहत की उम्मीदें धूमिल होती जा रही हैं। हाल ही में ईडी की जांच के आधार पर रामपुर के अजीमनगर थाने में एक नया मुकदमा दर्ज किया गया है।
इस नई एफआईआर में आजम खान के साथ-साथ जौहर ट्रस्ट, जौहर यूनिवर्सिटी और कुछ ठेकेदारों को भी नामजद किया गया है। आरोप है कि यूनिवर्सिटी के निर्माण में 494.46 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में केवल 78.32 करोड़ रुपये का पूंजीगत खर्च दिखाया गया—यानी करीब 416 करोड़ रुपये के हिसाब में भारी वित्तीय अनियमितता बरती गई। जांच एजेंसियों के बढ़ते शिकंजे के कारण फिलहाल उनकी रिहाई की राह बेहद मुश्किल नजर आ रही है।
