नई दिल्ली : चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. यह दुनिया की फैक्ट्री भी कहा जाता है. दुनियाभर के बड़े-बड़े ब्रांड् अपने प्रोडक्ट्स का प्रोडक्शन यहां कराते हैं. हालांकि, अब विदेशी निवेशक चीन से दूरी बनाते दिख रहे हैं. कोविड-19 के बाद दुनिया को इस बात का एहसास हुआ कि उन्हें चीन के अलावा भी दूसरे देशों की ओर देखना होगा ताकि भविष्य में डिमांड और सप्लाई में इतना बड़ा गैप फिर से न बनें. इसके अलावा चीन की नीतियों और रवैये से भी उसके खिलाफ एक माहौल बना है. इसका एक नमूना अप्रैल-जून तिमाही में आए बैलेंस ऑफ पेमेंट के आंकड़े. इस तिमाही में चीन में डायरेक्ट इनवेस्टमेंट 15 अरब डॉलर तक घट गया.
अगर यह गिरावट इस साल जारी रही तो 1990 के बाद पहली बार ऐसा होगा जब चीन का आयात उसके निर्यात से कम हो जाए और वह नेट आउटफ्लो वाला देश बन जाए. 2021 में चीन में रिकॉर्ड 344 अरब डॉलर का फॉरेन इन्वेस्टमेंट आया था. इसके बाद से वहां विदेशी निवेश में गिरावट दिख रही है. चीन की अर्थव्यवस्था में धीमापन और भू-राजनीतिक तनाव ने कंपनियों को चीन पर निर्भरता घटाने के लिए मजबूर कर दिया है.
बाहर निकलता पैसा
चीन से दूसरी तिमाही में 71 अरब डॉलर बाहर भेजे गए. यह वार्षिक आधार पर 80 फीसदी अधिक है. पिछले साल इसी समय पर केवल 39 अरब डॉलर चीन से बाहर भेजे गए थे. चीन के ट्रेड सरप्लस का डाटा में भी गड़बड़ियां बढ़ रही हैं. शुरुआती 6 महीने में चीन का ट्रेड सरप्लस 150 अरब डॉलर का हो गया. जबकि इसके डाटा में 87 अरब डॉलर की गड़बड़ी मिली.
यूएस ट्रेजरी ने इस अंतर को उजागर किया और चीन से आग्रह किया कि वह बताए कि ऐसा क्यों हो रहा है. इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड का इस पर कहना है कि ऐसा कैलकुलेशन के लिए अलग-अलग मैथड इस्तेमाल करने के कारण हो रहा है जिसका इस्तेमाल निर्यात और आयात को कैलकुलेट करने के लिए किया जाता है.