लखनऊ । मोती झील, ऐशबाग स्थिति माधव कला मंडप में ममता चैरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक एवं बीजेपी अवध क्षेत्र उपाध्यक्ष राजीव मिश्र कथा समिति के संयोजक प्रदीप शर्मा जी एवं कोषाध्यक्ष गौरव पांडे द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ के चौथे दिनक था प्रारंभ 51 विवाहित जोड़ो से दीप प्रज्वलन करने के उपरान्त आरंभ हुआ l आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ के चौथे दिन सुविख्यात कथा प्रवक्ता पूज्य संत पंडित राम शरण शास्त्री जी महाराज ने कृष्ण जन्म की दिव्य कथा सुनायी।भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देव की के गर्भ से भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है।

द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नाम क यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जार हाथा। रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देव की को तूबड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा का लब सता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठ वां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुन कर कंस वसुदेव को मार ने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उस से विनय पूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने लादूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है।
कंस ने देव की की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।
वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंसने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंदकी पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।

उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठ वें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कै दथे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्मधारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूलन हीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारा गृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुम को पार जाने का मार्ग दे देगी।’
उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्री कृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्व वत बंद हो गए।
अब कंस को सूचना मिली किव सुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है।
उसने बंदी गृह में जाकर देव की के हाथ से नवजात कन्या को छीन कर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मार ने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा। वृन्दावन में नंद बाबा के घर कृष्ण जन्मोत्सव मे नगर वासी आनंदित होते हैं और उसी प्रकार कथास्थल पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आनंदोत्सव मनाया।
कथा समापन आरती में मुख्य यजमान राजीव मिश्रा समिति के प्रमुख सदस्य अधिवक्ता संतोष माहेश्वरी, उपाध्यक्ष जितेश श्रीवास्तव, अमित गुप्ता, अधिवक्ता आशुतोष मिश्रा, अधिवक्ता प्रदीप शर्मा, पत्रकार संजय तिवारी, शशिकान्त शुक्ल रौनक सिंह इन्दिरा बहन, अनिल पाण्डेय एवं सैकडों की संख्या में भक्तजन मौजूद रहे मौजूद रहे रहे हजारों की संख्या में श्रोता गण को महाराज जी के द्वारा गाए गए दर्जनों भजनों पर झूमते हुए देखा गया।
आयोजकों ने लखनऊ वासियों से ज्यादा से ज्यादा संख्या में सपरिवार मोक्ष दायिनी कथा का श्रवण करने का आवाहन किया।
