इस्कॉन, लखनऊ द्वारा श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती जी महाराज का तिरोभाव दिवस मन्दिर मे पुष्पांजलि अर्पित कर मनाया गया l श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती का जन्म जगन्नाथ पुरी की पावन भूमि पर श्री चैतन्य महाप्रभु की शिष्य परंपरा में महान वैष्णव आचार्य श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी के घर 06 फ़रवरी 1874 को हुआ था, उन्हें बिमला प्रसाद नाम दिया गया । सात वर्ष की आयु में ही उन्होंने भगवद-गीता के 700 संस्कृत श्लोक कंठस्त कर लिए थे और उन श्लोकों पर अलंकृत टिप्पणियां दे सकते थे ।
पच्चीस वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले ही, बिमला प्रसाद ने संस्कृत, गणित और खगोल/ज्योतिष-शास्त्र में एक विद्वान पंडित के रूप में ख्याति प्राप्त कर ली थी । उनका ज्योतिषीय आलेख, सूर्य-सिद्धांत प्रकाशित होने के उपरांत उनकी अपरिमित विद्वत्ता के कारण उन्हें सिद्धांत सरस्वती की उपाधि दी गयी ।
सन 1905 में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती जी महाराज ने अपने पिता के परामर्श पर श्रील गौरकिशोर दास बाबाजी से आध्यात्मिक दीक्षा स्वीकार की, जिन्हें महान संत तथा वैष्णव आचार्य के रूप में पहचाना जाता है ।
श्रील गौरकिशोर बाबाजी ने भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी महाराज को अपना आशीर्वाद देते हुए उनसे आग्रह किया कि वे “बाकी सारे कार्यों का त्याग करके परम सत्य का प्रचार करें” ।

सन 1918 में सिद्धांत सरस्वती ने आध्यात्मिक जीवन में संन्यास ग्रहण किया और तब उन्हें श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज की उपाधि मिली । सम्पूर्ण भारतवर्ष में गौड़ीय वैष्णव सिद्धांत के प्रचार हेतु उन्होंने चौंसठ गौड़ीय मठों का गठन किया । इस प्रचार आंदोलन का मुख्यालय श्री चैतन्य महाप्रभु के जन्मस्थान, श्रीधाम मायापुर में चैतन्य-गौड़ीय-मठ को बनाया गया ।
परम पूज्य भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी महाराज इस्कॉन के संस्थापकाचार्य श्रील प्रभुपाद जी के ग़ुरू एवं कई महत्वपूर्ण अनुवादों, टीकाओं तथा सिद्धांत आलेखों के रचयिता थे तथा प्रचार कार्य के लिए वे मुद्रण-यंत्र (छपाई मशीन) को सबसे अधिक प्रभावशाली समझते थे ।
वे स्वयं ही इस गुरु-शिष्य परंपरा में वे प्रथम ऐसे गुरु थे जिन्होंने प्रचार हेतु अपने सन्यासी शिष्यों को पाश्चात्य-पहनावे तथा पैदल न चलकर आधुनिक मोटर-गाड़ियों में चलने की अनुमति दी ।

परम पूज्य भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी महाराज नें सन 1914 में अपने पिता श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी के अप्राकट्य (देहावसान) के उपरांत उनके द्वारा प्रकाशित पत्रिका “सज्जन-तोषणी” के संपादक का कार्यभार संभाला तथा गौड़ीय-वैष्णव साहित्य प्रकाशन हेतु भागवत-प्रेस की स्थापना की ।
1930 तक श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती जी महाराज नें अपने इस आंदोलन का प्रचार-प्रसार किया तथा भारतीय आध्यात्मिक-जगत में गौड़ीय वैष्णव सिद्धांत को अग्रणी शक्ति के रूप में पुनःस्थापित किया ।
01 जनवरी 1937 को पौष माह कृष्ण पक्ष चतुर्थी को श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद इस भौतिक संसार से विदा लेकर भगवद्धाम चले गए।
