10 फरवरी को लखनऊ विश्वविद्यालय के न्यू कैंपस में बड़ी संख्या में छात्रों ने यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस 2026 के समर्थन में प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन उच्च शिक्षा में समानता, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की मांग को लेक0र छात्रों की बढ़ती एकजुटता का स्पष्ट संकेत है।

इस प्रदर्शन में आइसा, एनएसयूआई, एससीएस और बीएएसएफ ने एकजुट होकर भागीदारी की। प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण और अनुशासित होने के बावजूद परिसर में भारी पुलिस बल की तैनाती की गई थी। प्रदर्शन से पहले एहतियाती नोटिस भी जारी किए गए थे, जो यह दिखाते हैं कि प्रशासन और पुलिस समानता, इक्विटी और संवैधानिक अधिकारों की बात कर रहे छात्रों को डराने और दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

छात्र संगठनों ने इस चयनात्मक और पक्षपातपूर्ण रवैये की कड़ी निंदा की है। एक ओर जहां यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस के समर्थन में आवाज उठाने वाले छात्रों पर निगरानी, नोटिस और पुलिस दबाव बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस के खिलाफ हुए जातिवादी और मनुवादी प्रदर्शनों को बिना किसी रोक–टोक के, कई जगहों पर पुलिस संरक्षण में होने दिया गया। यदि प्रशासन और पुलिस को सच में कानून–व्यवस्था की चिंता होती, तो यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस के खिलाफ हुए प्रदर्शन पुलिस सुरक्षा में क्यों होते।
प्रदर्शन कर रहे छात्रों की केंद्रीय मांग बिल्कुल स्पष्ट है कि यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस 2026 को रोहित एक्ट के साथ लागू किया जाए, ताकि विश्वविद्यालयों में दलित, बहुजन, आदिवासी, अल्पसंख्यक और अन्य हाशिए पर पड़े छात्रों के लिए जवाबदेही, सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित की जा सके।
हर्षवर्धन, संयुक्त सचिव, आइसा उत्तर प्रदेश, ने कहा कि भारी पुलिस तैनाती और पहले से दिए गए नोटिस यह दिखाते हैं कि प्रशासन समानता और न्याय की मांग से असहज है। उन्होंने कहा कि यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस का समर्थन करना कोई अपराध नहीं है, लेकिन चूंकि ये गाइडलाइंस विश्वविद्यालयों में जमी हुई जातिगत असमानताओं को चुनौती देती हैं, इसलिए छात्रों को डराने की कोशिश की जा रही है।
शुभम खरवार, महासचिव, एनएसयूआई उत्तर प्रदेश, ने कहा कि छात्र बराबरी और न्यायपूर्ण शिक्षा की मांग कर रहे हैं, लेकिन इन मांगों पर संवाद करने के बजाय प्रशासन डर और पुलिस दबाव के जरिए छात्रों को चुप कराना चाहता है। उन्होंने कहा कि यह चयनात्मक रवैया प्रशासन और पुलिस के पक्षपात को उजागर करता है।
नवीन यादव, अध्यक्ष, एससीएस लखनऊ विश्वविद्यालय न्यू कैंपस, ने कहा कि न्यू कैंपस में हुआ प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक था। इसके बावजूद भारी पुलिस मौजूदगी यह बताती है कि प्रशासन छात्रों को कानून–व्यवस्था की समस्या की तरह देख रहा है, जबकि उसे छात्रों की जायज मांगों पर गंभीरता से बातचीत करनी चाहिए।
वरुण आज़ाद, बीएएसएफ, ने कहा कि जब छात्र इक्विटी और रोहित एक्ट की मांग करते हैं, तो उन्हें नोटिस और पुलिस दबाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन जातिवादी और मनुवादी सोच को खुला संरक्षण दिया जाता है। इससे साफ हो जाता है कि मौजूदा व्यवस्था किसके साथ खड़ी है।
अमरेंद्र कुमार अंकुर, अध्यक्ष, युवा, ने अपने बयान में कहा कि यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस उच्च शिक्षा में बराबरी की दिशा में एक जरूरी कदम हैं, लेकिन जब दलित–बहुजन छात्र इनके समर्थन में खड़े होते हैं, तो राज्य उन्हें दबाने पर उतर आता है। उन्होंने कहा कि रोहित एक्ट के बिना इक्विटी की कोई भी बात अधूरी है और यह लड़ाई केवल नियमों की नहीं, बल्कि सम्मान और न्याय की लड़ाई है।
हरीश रावत, राष्ट्रीय सचिव, एससीएस, ने कहा कि लखनऊ विश्वविद्यालय में जो कुछ हो रहा है, वह देश भर में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हो रहे हमलों का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण छात्र आंदोलनों को पुलिस और नोटिस के जरिए दबाने की कोशिश यह दिखाती है कि शिक्षा संस्थानों को सवाल पूछने की जगह नहीं रहने दिया जा रहा।
इस प्रदर्शन और संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति के साथ समर, आइसा; शांतम निधि, आइसा; आर्यन कुमार, छात्र, लखनऊ विश्वविद्यालय; रोहित कुमार, छात्र, लखनऊ विश्वविद्यालय; प्रिंस प्रकाश, राष्ट्रीय समन्वयक, एनएसयूआई; अहमद, प्रदेश उपाध्यक्ष, एनएसयूआई उत्तर प्रदेश; रंजीत वर्मा, बीएएसएफ; तथा डॉ. अखिलेश यादव, पीएचडी ने भी अपना समर्थन व्यक्त किया।
छात्र संगठनों ने स्पष्ट किया कि डर, नोटिस और पुलिस दबाव के जरिए समानता की इस लड़ाई को रोका नहीं जा सकता। जब तक यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस 2026 को रोहित एक्ट के साथ लागू नहीं किया जाता और विश्वविद्यालय सभी छात्रों के लिए गरिमा, न्याय और समान अवसर के स्थान नहीं बनते, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
