तहज़ीब और विरासत की नगरी लखनऊ में हुसैनाबाद स्थित टूरिस्ट फैसिलिटेशन सेंटर की निविदा प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं दृष्टिगोचर हुई हैं।

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

तहज़ीब और विरासत की नगरी लखनऊ में हुसैनाबाद स्थित टूरिस्ट फैसिलिटेशन सेंटर की निविदा प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं दृष्टिगोचर हुई हैं। अधिवक्ता रोहित कान्त द्वारा शासन को भेजी गई विस्तृत विधानिक आपत्ति में यह उजागर किया गया है कि मात्र तीन माह के अंतराल में टेंडर की शर्तों को इस प्रकार संशोधित किया गया जो किसी एक व्यक्ति विशेष की कम्पनी – को अनुचित लाभ पहुँचाने हेतु प्रतीत होता है।

+ टेंडर में संदिग्ध परिवर्तन – एक दृष्टि में:

1. सरकारी राजस्व में भारी कटौती: वार्षिक किराया १२० लाख से घटाकर मात्र १८ लाख, राजकोष को प्रतिवर्ष लाखों की हानि ।

2. पात्रता में विरोधाभासी फेरबदल: न्यूनतम टर्नओवर १४ करोड़ से उछालकर ११० करोड़ : स्थानीय प्रतिस्पर्धियों को टेंडर प्रक्रिया से बाहर करने की कूटनीति।

3. सरकारी धन से बिजली बिल नई शर्त अनुसार १४८ लाख वार्षिक विद्युत व्यय अब प्राधिकरण वहन करेगा- जनता के धन का अनुचित उपयोग।

4. ठेके की दोगुनी अवधि: ५ वर्ष से बढ़ाकर १० वर्ष – किसी भी सार्वजनिक औचित्य के बिना एकतरफा निर्णय। 5. अनुभव शर्तों में शिथिलता: सरकारी विभागों के साथ कार्य अनुभव की अनिवार्यता समाप्त – निजी क्षेत्र

अनुभव को मान्यता ।

# कानूनी परिप्रेक्ष्य: भारत के सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों ने अनेकशः स्पष्ट किया है कि राज्य अनुबंध एवं सरकारी निविदाएँ अनुच्छेद १४ (समानता का अधिकार) के अधीन हैं। टेंडर शर्तों का मनमाना संशोधन, प्रतिस्पर्धा का कृत्रिम सीमाकरण और जन-संसाधनों का अवमूल्यन, ये सब शासन की नैतिक एवं विधिक परिधि का उल्लंघन हैं। किसी एक व्यक्ति या संस्था के अनुकूल निविदा की संरचना करना न केवल विधि-विरुद्ध है, अपितु यह लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध भी है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ईमानदारी एवं पारदर्शिता के ब्रांड एम्बेसडर माने जाते हैं। ऐसे में लखनऊ की सांस्कृतिक धरोहर से परिपूर्ण पुराने लखनऊ के हुसैनाबाद क्षेत्र एवं सांस्कृतिक विरासत के साथ यह खिलवाड़ न केवल असहनीय है, बल्कि यह उस शासन-दर्शन के प्रतिकूल भी है जिसका ढिंढोरा पीटा जाता है। जब विरासत, वित्त और विधि, तीनों एक साथ प्रश्नों के घेरे में हों, तो यह केवल एक फ़ाइल का विवाद नहीं रहता – यह शासन की आत्मा का परीक्षण बन जाता है। + माँगें +

1. संदिग्ध निविदा प्रक्रिया पर तत्काल रोक एवं उच्च-स्तरीय जाँच।

2. टेंडर संशोधन को स्वीकृति देने वाली फ़ाइलों की पारदर्शी समीक्षा।

3. हुसैनाबाद की विरासत के अनुरूप, नियम-सम्मत और निष्पक्ष पुनः- निविदा प्रक्रिया।

4. यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ में जनहित याचिका दायर कर इस अवैधानिकता के प्रति विधिक अनुतोष का अनुरोध किया जाएगा ।

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