नितिन नबीन की ताजपोशी : बीजेपी नेतृत्व की रणनीतिक जीत या आरएसएस से बढ़ती दूरी?

टॉप न्यूज़ देश

बिहार सरकार में मंत्री और पार्टी के अपेक्षाकृत युवा चेहरे नितिन नबीन को भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाना केवल एक संगठनात्मक नियुक्ति नहीं है, बल्कि इसके कई राजनीतिक मायने हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल समाप्त हुए लगभग तीन वर्ष हो गए हैं और लगातार एक्सटेंशन के कारण बीजेपी की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे थे। इसकी पृष्ठभूमि में नितिन नबीन की नियुक्ति को दो दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है—क्या यह आरएसएस की पसंद का परिणाम है या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाले बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की स्पष्ट जीत?
45 वर्षीय नितिन नबीन का राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत विवादमुक्त रहा है। पांच बार के विधायक, युवा मोर्चा से निकले संगठनात्मक नेता और छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्य के प्रभारी के तौर पर उनकी भूमिका ने उन्हें एक “सेफ चॉइस” बनाया है। बीजेपी के लिए यह संदेश देना भी आसान है कि वह युवाओं को आगे लाने वाली पार्टी है, जबकि विपक्ष में नेतृत्व संकट साफ दिखता है।
आरएसएस बनाम मोदी-शाह मॉडल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नियुक्ति बीजेपी और आरएसएस के बदलते रिश्तों को भी रेखांकित करती है। अतीत में नितिन गडकरी जैसे अध्यक्षों को संघ का क़रीबी माना जाता था, लेकिन नितिन नबीन को वैसा चेहरा नहीं समझा जाता। इसके उलट, उनके राजनीतिक झुकाव को लंबे समय से नरेंद्र मोदी के प्रति अनुकूल माना जाता रहा है।
वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर यह स्पष्ट संकेत दिया गया है कि अब पार्टी के अहम फैसलों में अंतिम शब्द मोदी-शाह नेतृत्व का है, न कि संघ की पसंद का। यह बीजेपी के भीतर सत्ता के केंद्रीकरण की उस प्रवृत्ति को और मज़बूत करता है, जो पिछले एक दशक में लगातार दिखाई दी है।
बिहार और आने वाले चुनावों का गणित
इस फैसले को बिहार की राजनीति से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। नीतीश कुमार के बाद बिहार में बीजेपी के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर मंथन चल रहा है। ऐसे में एक बिहार के नेता को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी देना भविष्य की तैयारी का संकेत भी हो सकता है। साथ ही, कायस्थ समुदाय को प्रतिनिधित्व देकर बीजेपी अपने पारंपरिक वोटबेस को यह संदेश देना चाहती है कि सत्ता में भागीदारी केवल वोट तक सीमित नहीं है।
हेडलाइन मैनेजमेंट और टाइमिंग
नियुक्ति की टाइमिंग भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। जिस दिन कांग्रेस दिल्ली में रैली कर बीजेपी पर हमलावर थी, उसी दिन नितिन नबीन का नाम सामने आना यह दिखाता है कि बीजेपी अब भी ‘नैरेटिव कंट्रोल’ में माहिर है। चर्चा का केंद्र तुरंत बदल गया और विपक्ष की आवाज़ हाशिए पर चली गई।
चुनौतियां कम नहीं
हालांकि नितिन नबीन के सामने चुनौतियां भी गंभीर हैं। वे पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से जूनियर हैं और राष्ट्रीय राजनीति का उनका अनुभव सीमित रहा है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े चुनाव सामने हैं, साथ ही विपक्ष के लगातार आक्रामक आरोप भी। ऐसे में उनका प्रदर्शन ही तय करेगा कि वे केवल एक अंतरिम प्रयोग हैं या भविष्य के स्थायी अध्यक्ष।
क्या यह मोदी-शाह की जीत है?
नितिन नबीन का कार्यकारी अध्यक्ष बनना प्रतीकात्मक रूप से मोदी-शाह नेतृत्व की जीत के रूप में देखा जा सकता है, जो यह दिखाता है कि बीजेपी में अब संगठन और सत्ता दोनों की दिशा शीर्ष नेतृत्व तय करता है। आरएसएस की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन यह नियुक्ति संकेत देती है कि पार्टी अब अपने फैसलों में अधिक स्वायत्त और केंद्रीकृत मॉडल पर आगे बढ़ रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *