लखनऊ, गुरुवार का दिन साईं भक्तों के लिए बेहद अविस्मरणीय बन गया, जब साईं बाबा के परम धाम शिरडी से चरण पादुकाएं लखनउ में पधारीं। शिरडी से पधारी साई बाबा की पावन चरण पादुकाओं के आने पर पूरा वातावरण शंखनाद, ढोल-नगाड़ों व आतिशबाजी से गूंज उठा। साईं मंदिर कपूरथला पर मंदिर पुजारियों और भक्तों ने परंपरागत रीति से चरण पादुकाओं का स्वागत किया और उन्हें गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा में होटल ‘द गोल्डेन सेलिब्रेशन’ परिसर तक लाया गया। जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल हुए। श्री साईं बाबा संस्थान विश्वस्त व्यवस्था ट्रस्ट, शिरडी के सीईओ गोरक्षक गाडिलकर स्वयं चरण पादुकाओं को लेकर पहुंचे। उन्होंने कहा कि रास्ते भर भक्तों का जो उत्साह देखने को मिला, वह अभूतपूर्व था। गाडिलकर ने कहा कि लखनऊ में श्रद्धालुओं की आस्था देखकर मन प्रसन्न हो गया।
गुरुवार को होटल ‘द गोल्डेन सेलिब्रेशन’ में पादुकाओं का प्रतिष्ठापन किया जाएगा। प्रातः 10 बजे से रात्रि 10 बजे तक भक्तों ने पादुकाओं का दर्शन किया। दोपहर 12 बजे मध्यांन आरती हुई, जिसके बाद दोपहर 1 बजे से गुरु शुभ्रम बहल ने साईं कथा सुनाई। जिसका आनंद साईं भक्तों ने जमकर उठाया। शाम 4 बजे मीनू सचदेवा और साईं सेवक उमाशंकर महाराज ने मनमोहक भजनों की प्रस्तुति दी, जबकि धूप आरती सायं 6:30 बजे हुई। इसके बाद साईं भजन सम्राट सक्सेना बंधु और राधा राठौर ने श्रोताओं को भक्ति संगीत से बांधा। यह कार्यक्रम देर रात तक चला। सुबह से देर रात तक अटूट लंगर की व्यवस्था भी रही।

पहली बार लखनऊ में दर्शन….
साईं बाबा की 110 साल पुरानी चरण पादुकाएं पहली बार लखनऊ पहुंची हैं। गोरक्ष गडिलकर ने बताया कि यात्रा का उद्देश्य उन भक्तों, बुजुर्गों और दिव्यांगों तक बाबा का आशीर्वाद पहुंचाना है, जो शिरडी नहीं जा पाते। उन्होंने कहा कि बाबा की पादुका मतलब बाबा स्वयं। यह दर्शन किसी भी भक्त के लिए जीवनभर की इच्छा पूर्ण होने जैसा है। 1918 में समाधि से पूर्व बाबा जिन पादुकाओं को पहनते थे, वही मूल पादुकाएं यहां दर्शन के लिए लाई जा रही हैं। इनमें किसी भी तरह की सजावट नहीं की गई है और इन्हें बाबा के समय की ही अवस्था में संरक्षित रखा गया है। इनका संरक्षण आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया करता है। पादुकाओं को छूने की अनुमति नहीं है, भक्तों ने कांच के कवर से दर्शन किये।

कार्यक्रम के आयोजक राजेश अरोड़ा ‘बब्बू’ ने बताया कि यह पादुकाएं 2017-18 में दूसरी बार म्यूजियम से बाहर निकाली गई थीं। अप्रैल 2024 में दक्षिण भारत में इनका दौरा हुआ और अब उत्तर भारत की यात्रा शुरू हुई है। लखनऊ में यह आयोजन भक्तों के लिए एक दुर्लभ और पावन अवसर लेकर आया है, जिसका इंतजार लंबे समय से किया जा रहा था।
