प्रेम, विश्वास और समर्पण ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है-स्वामी जी

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

भगवान श्री रामकृष्ण देव जी का 190वाँ जन्मोत्सव, के पावन अवसर पर रामकृष्ण मठ, निराला नगर, लखनऊ में 04 दिवसीय उत्सव दिन गुरूवार, दिनांक 19 फरवरी से रविवार, 20 फरवरी, 2026 तक मनाया जा रहा है तथा समस्त कार्यक्रम हमारे यूट्यूब चैनेल: ‘रामकृष्ण मठ लखनऊ’ के माध्यम से सीधा प्रसारित किया जा रहा है। यूट्यूब के माध्यम से इस उत्सव को दुनिया भर में तमाम भक्तों ने देखा।

श्री रामकृष्ण मन्दिर के वृहद परिसर में कार्यक्रम की शुरूआत सुबह 5ः00 बजे शंख, निनाद व मगंल आरती के बाद सुप्रभातम एवं प्रार्थना रामकृष्ण मठ, के अध्यक्ष, स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज द्वारा हुई। भक्तगणों की सतत् भागीदारी के साथ सूर्योदय से सूर्यास्त तक निरन्तर जप-यज्ञ, (बारी-बारी से इच्छुक भक्तगणों द्वारा भगवान का निरन्तर नाम जपन) का आयोजन रामकृष्ण मठ के पुराने मंन्दिर में प्रत्यक्ष रूप व परोक्ष रूप से इन्टरनेट के माध्यम से सम्मिलित होकर हुआ।

ऊषा कीर्तन, विशेष पूजा व भक्तिगीत गाया गया। उषा कीर्तन के दौरान साधुओं और भक्तों ने रामकृष्ण मंदिर में लगभग एक घंटे तक भगवान की महिमा का गुणगान और जयकारे लगाए। इस अवसर पर स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज द्वारा विशेष सत् प्रसंग (ऑनलाइन) ‘‘सबके त्राता श्री रामकृष्ण’ विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि भगवान श्री रामकृष्ण को “सबके त्राता” अर्थात समस्त मानवता का उद्धार करने वाला इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन द्वारा प्रेम, भक्ति और सार्वभौमिक धर्म का संदेश दिया। बचपन से ही उनका मन ईश्वर-चिंतन और साधना में लगा रहता था। उन्होंने विभिन्न धार्मिक मार्गों का अनुसरण कर यह अनुभव किया कि सभी धर्म एक ही परम सत्य की ओर ले जाते हैं। उनका प्रसिद्ध सिद्धांत था-“यतो मत, ततो पथ”। वे सिखाते थे कि प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है, इसलिए मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है।
उनकी दिव्य शिक्षाओं से प्रेरित होकर उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने विश्वभर में आध्यात्मिक जागरण का कार्य किया। आज भी उनके आदर्श रामकृष्ण मिशन के माध्यम से समाज सेवा और आध्यात्मिक उत्थान का कार्य कर रहे हैं। श्री रामकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और सहिष्णुता में निहित है। वे वास्तव में सबके त्राता, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत हैं।
तत्पश्चात रामकृष्ण मठ, लखनऊ के स्वामी रामाधीशानन्द द्वारा चण्डीपाठ प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात श्री अशोक मुखर्जी, कानपुर द्वारा मधुर भक्तिगीत प्रस्तुत किया गया उस दौरान तबले पर संगत शुभम राज ने दिया।

भगवान श्री रामकृष्ण के जीवन पर स्वामी विश्वदेवानन्द, रामकृष्ण मठ, लखनऊ ने प्रवचन दिया और उनकी जीवनी ‘‘श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग’’ का पाठ करते हुये उनके त्याग की भावना को उजागर उनके जन्म से करते हुये कहा कि नवजात शिशु ने अपने जन्म स्थान के पास खुद को राख से ढक लिया था जो उनके त्याग की भावना को उजागर करना था।
सुबह 10ः30 बजे हवन किया गया और उसके बाद पुष्पांजलि (फूलों का अर्पण) लगभग 600 भक्तों द्वारा किया गया।
भक्तिगीत एवं भोगारती के पश्चात् मंदिर के पूर्वी प्रांगण में उपस्थित हजारों भक्तगणों के बीच पके हुये प्रसाद का वितरण हुआ।

संध्या आरती के उपरान्त एक जनसभा का आयोजन किया गया। जिसमें रामकृष्ण मठ, लखनऊ के स्वामी विश्वदेवानन्द ने ‘‘आर्दश मातृ साधक श्री रामकृष्ण’’ विषय पर प्रवचन देते हुये भक्तगणों को बताया कि भगवान श्री रामकृष्ण को “आदर्श मातृ-साधक” कहा जाता है, क्योंकि उनकी समस्त साधना का केंद्र था – जगज्जननी माँ की उपासना। वे दक्षिणेश्वर काली मंदिर में माँ काली की आराधना करते हुए दिव्य समाधि और ईश्वरानुभूति की उच्चतम अवस्था तक पहुँचे। उनके लिए माँ काली केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि साक्षात् जीवंत, करुणामयी, उत्तर देने वाली माँ थीं। वे बालक की तरह सरल हृदय से माँ को पुकारते थे, उनसे बात करते थे, और हर कार्य में उनकी आज्ञा मानते थे। उनकी भक्ति में पूर्ण आत्मसमर्पण, निष्कपट प्रेम और अनन्य विश्वास झलकता था। वे कहते थे कि जब साधक हृदय से पुकारता है, तब माँ अवश्य उत्तर देती हैं।
श्री रामकृष्ण की मातृ-भक्ति ने संसार को यह संदेश दिया कि ईश्वर को माता रूप में मानकर प्रेम और श्रद्धा से साधना करने पर आध्यात्मिक अनुभव संभव है। उनका जीवन सिखाता है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का स्थान नहीं होता-केवल समर्पण और प्रेम ही मार्ग है। इस प्रकार श्री रामकृष्ण आदर्श मातृ-साधक के रूप में आज भी भक्तों के हृदय में जीवित हैं और मातृ-भक्ति का दिव्य पथ प्रकाशित करते हैं।

वहीं रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष श्रीमत् स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज ने अपने अध्यक्षीय भाषण में ‘‘माँ भवतारिणी के मनुष्य रूप श्री रामकृष्ण’’ पर भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि भक्तजन उन्हें माँ भवतारिणी (माँ काली) का ही मनुष्य रूप मानते हैं। उनका संपूर्ण जीवन जगज्जननी की उपासना, अनुभव और संदेश का जीवंत उदाहरण है। वे दक्षिणेश्वर मंदिर में पुजारी के रूप में नियुक्त हुए। श्रीरामकृष्ण उक्त मन्दिर में पूजा करते थे, परन्तु अन्य साधारण पुजारियों की भाँति वे कोरी पूजा नहीं करते थे, परन्तु पूजा करते समय ऐसे मग्न हो जाते थे कि उस प्रकार की अलौकिक मग्नता ‘देखा सुना कबहुँ नहीं कोई’ – और यह अक्षरशः सत्य भी क्यों न हो? ईश्वर ही ईश्वर की पूजा कर रहे थे! उस भाव का वर्णन कौन कर सकता है जिससे श्रीरामकृष्ण प्रेरित हो, ध्यानावस्थित हो श्री कालीदेवी पर फूल चढ़ाते थे! आँखो में अश्रुधारा बह रही है, तन-मन की सुध नहीं, हाथ कहैं, हृदय उल्लास से भरा है, मुख से शब्द नहीं निकलते हैं, पैर भूमि पर स्थिर नहीं रहते है और घण्टी, आरती आदि तो सब किनारे ही पड़ी रही दृ श्रीकालीजी पर पुष्प चढ़ा रहे हैं और थोड़ी ही देर में उन्हें ही उन्हें देखते हैं – स्वयं में भी उन्हीं को देख रहे हैं और कम्पित कर से अपने ही ऊपर फूल चढ़ाने लगते हैं, कहते हैं दृ माँ-माँ-तुम-मैं-मैं-तुम और ध्यानमग्न हो समाधिस्थ हो जाते हैं। देखनेवाले समझते हैं कुछ का कुछ, परन्तु ईश्वर मुसकराते हैं, बड़े ध्यान से सब देखते हैं और विचारते होंगे कि यह रामकृष्ण हूँ तो मैं ही।
“ठाकुर सर्वदा कहा करते, ब्रह्म और शक्ति अभेद! जब स्वरूपावस्था में रहते हैं, तब कहता हूँ ब्रह्म। जब सृष्टि, स्थिति, प्रलय करते हैं तब कहता हूँ शक्ति- आद्या शक्ति, काली। स्वामीजी से ठाकुर ने कहा था, तुम जिसको ब्रह्म कहते हो, मैं उनको ही काली कहता हूँ। “ठाकुर ही यह ब्रह्मशक्ति काली हैं। किन्तु लीला के लिए भक्त और भगवान, पुत्र और माँ-रूप धारण किया।
स्वामी जी ने कहा कि “माँ भवतारिणी के मनुष्य रूप” के रूप में श्री रामकृष्ण का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का स्थान नहीं होता -केवल प्रेम, विश्वास और समर्पण ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है।

यह कार्यक्रम श्री अशोक मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत भक्ति गीतों के साथ समाप्त हुआ, जिसमें सभी उपस्थित भक्तगणों के मध्य पैकेट में प्रसाद का वितरण किया गया।

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