लखनऊ। यू पी प्रेस क्लब के सभागार में युवा रचनाकार मंच, लखनऊ द्वारा डा. उमेश चन्द्र श्रीवास्तव जी की सद्यः प्रकाशित काव्य-कृति ‘चिर अभिलाषा’ का लोकार्पण एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। जिसके अध्यक्ष प्रो. हरिशंकर मिश्र, मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. विद्या विन्दु सिंह, विशिष्ट अतिथि (द्वय) डॉ. मृदुल शर्मा एवं डॉ. दिनेश चन्द्र अवस्थी जी थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ शारदे के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन एवं कृतिकार डा. उमेश चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा रचित सरस्वती वंदना श्वेतं वर्ण, हृदयं रमणम।’ से डॉ. मोना पाठक के सस्वर पाठ से हुआ। इसका सफल संचालन डॉ रश्मिशील, संयोजन आवारा नवीन एवं नवीन शुक्ल ‘नवीन’ ने किया।
इस अवसर पर कृतिकार डा. उमेश चन्द्र एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अनीता श्रीवास्तव को साहित्यकार संसद लखनऊ की ओर से अध्यक्ष मुनेन्द्र शुक्ल एवं महामंत्री नवीन शुक्ल ‘नवीन’ ने अंगवस्त्र, माला एवं स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया गया।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. हरिशंकर मिश्र ने कहा-काव्य कृति ‘चिर अभिलाषा भावोच्छ्वसित, कल्पना प्रवण और प्रकृति छाया की स्निग्धता से सगुंफित काव्यकृति है। अभिलाषा का भाव प्रकृति के मूल में चिरकाल से विद्यमान है तथा सभी जड़-चेतन को न्यूनाधिक रूप में अभिप्रेरित तथा सान्निध्य हेतु संचरित करता रहता है।
मुख्य अतिथि डॉ. विद्या विन्दु सिंह ने कहा चिरंजीव उमेश चन्द्र श्रीवास्तव सूक्ष्मतम भावों की छायात्मक अभिव्यक्ति करने वाले कवियों की श्रेणी में उनकी अपनी पहचान है। पूर्व में उनकी अनुनाद’ काव्यकृति कई वर्ष पहले प्रकाश में आ चुकी है तथा इसका अंग्रेजी अनुवाद के रूप में “The Shirll Of Tears” द्विभाषी (Bilingual) भी प्रकाशित हो चुकी है, सह्रदयों द्वारा अपनाई और सराही गई है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि चिर अभिलाषा’ काव्यकृति भी साहित्य जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ने में सफल होगी।
चेतना स्रोत पत्रिका के यशस्वी सम्पादक डॉ. गोपालकृष्ण शर्मा ‘मृदुल’ ने कहा कि डा. उमेश चन्द्र श्रीवास्तव की नवीनतम काव्यकृति ‘चिर अभिलाषा’ आई है जिसमें उन्होंने प्रेम की सत्ता और महत्ता को अपने काव्य का विषय बनाया है। वास्तव में प्रेम की व्याप्ति सृष्टि में सर्वत्र है।
अधिवक्ता एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. दिनेश चन्द्र अवस्थी ने कहा कि- ‘चिर अभिलाषा’ कृति के सृजन हेतु कवि उमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने एक नवीन छन्द गढ़ा है जिसमें 16-16 मात्राओं की आठ पंक्तियाँ हैं, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुकांत की व्यवस्था है, छठी और आठवीं पंक्ति का अंत ‘उठी’ शब्द से और सातवीं पंक्ति अनिवार्य रूप से ‘जन्मों की चिर अभिलाषा फिर’ हर छन्द में रखी गई है। यह छन्द अपने में अनूठा तो है ही, कवि की सृजन सामर्थ को भी सिद्ध करता है।
बृज-कुमुदेश पत्रिका के सम्पादक एवं वरिष्ठ छन्दकार अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक’ ने कहा कि चिर अभिलाषा’ कृति की भाषा विशुद्ध, साहित्यिक, छोटे-छोटे तत्सम शब्दों से सुसज्जित, माधुर्य और प्रसाद गुण से युक्त है। सहज सम्प्रेषणीयता और कोमलकांत शब्दावली का प्रयोग इस कृति की भाषा का वैशिष्ट्य है। डा उमेश चन्द्र को मेरी ओर से बहुत-बहुत साधुवाद ।
इनके अतिरिक्त सर्वश्री डॉ. उमाशंकर शुक्ल ‘शितिकण्ठ’, डॉ. विश्वंभर शुक्ल, सी एल सिंह, सतीश चंद्र श्रीवास्तव, इंजी. नरेश चन्द्र श्रीवास्तव, पूर्व मण्डलाध्यक्ष रो, शैलेन्द्र जैन, डा. डी. सी. श्रीवास्तव, डा. विजया श्रीवास्तव, डॉ. नरेन्द्र भूषण, डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी, डॉ. तेजनारायण श्रीवास्तव ‘राही’, डॉ. उमेश प्रकाश, डॉ. गोबर गणेश आदि वक्ताओं ने भी कृति एवं कृत्तिकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
सारस्वत समारोह में ऋचा नितेश श्रीवास्तव प्रारब्ध (निर्भय), लवी-निखिल श्रीवास्तव धृति, सुनाक्षी-शिशिर नवीन, अनिल मिश्र, मृत्युंजय प्रसाद गुप्त, रमाशंकर सिंह, आशुतोष पाठक, मनमोहन बाराकोटी एवं डॉ. अवधी हरि आदि की गरिमामयी उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
आवारा नवीन
संस्थापक
युवा रचनाकार मंच,
लखनऊ
