“ईश्वर को पाने के लिए मन को बालक जैसा सरल बनाओ’’- स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज समापन दिवस पर आध्यात्मिक शिविर का आयोजन किया गया।

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

दिनांक 19 फरवरी, 2026 से चल रहे 04 दिवसीय भगवान श्री रामकृष्ण देव जी के 190वां जन्मोत्सव समारोह के चौथे एवं अन्तिम दिन रविवार, 22 फरवरी, 2026 को निम्नलिखित कार्यक्रमों का आयोजन रामकृष्ण मठ पर सम्पन्न हुआ।

प्रातः 5:00 मंगल आरती के 6:50 पर वैदिक मंत्रोच्चारण तत्पश्चात प्रातः 7ः15 बजे स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज द्वारा (ऑनलाइन) सत् प्रसंग हुआ तथा प्रातः 8ः30 बजे से दोपहर 1ः00 बजे के मध्य एक आध्यात्मिक शिविर (पूर्व में नामांकित प्रतिभागियों व भक्तों के लिए) का आयोजन किया गया जिसमे लगभग 400 युवाओं, भक्तों एवं विवेकानन्द कॉलेज ऑफ नर्सिग की छात्राओं ने भाग लिया। जिसकी शुरूआत मौन प्रार्थना, वैदिक मंत्रोच्चारण, पुष्पांजलि व नामावली (भजन) ‘‘हे प्रेमरूप श्री रामकृष्ण’’ के साथ हुआ। निर्देशित ध्यान रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष, स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी महाराज के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात सामूहिक रूप से भजन ‘श्री गुरू प्रार्थना’ रामकृष्ण मठ के स्वामी इष्टकृपानन्द के निर्देशन में हुयी।
द्वितीय सत्र में उद्बोधन गीत श्री अशोक मुखर्जी, कानपुर द्वारा प्रस्तुत किया गया, उस दौरान तबले पर उनका संगत रामकृष्ण मठ लखनऊ के स्वामी रामाधीशानंद ने और खोल पर संगत श्री गोपाल भट्टाचार्य ने दिया। इसके उपरान्त उत्तर प्रदेश-उत्तराखण्ड रामकृष्ण विवेकानन्द भाव प्रचार परिषद के सलाहकार श्री सुखद राम पाण्डेय ने ‘श्री रामकृष्ण वचनामृत’ से पाठ किया।

इस अवसर पर रामकृष्ण मिशन होम ऑफ सर्विस, वाराणसी से पधारे स्वामी धीशानन्द जी द्वारा ‘भक्तों के लिए श्री रामकृष्ण के विशेष सुझाव’ विषय पर प्रवचन दिया उन्होंने कहा कि श्री रामकृष्ण का संपूर्ण जीवन ईश्वर-प्रेम, निष्कपट भक्ति और आध्यात्मिक अनुभव का जीवंत उदाहरण है। श्री रामकृष्ण के उपदेश सरल शब्दों में गहरे आध्यात्मिक सत्य प्रकट करते हैं। भक्तों के लिए उनके संदेश केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा हैं।
श्री रामकृष्ण कहते थे कि ईश्वर को पाने के लिए विद्वता या तर्क की नहीं, बल्कि निर्मल और बालक-सा सरल हृदय चाहिए। कपट, अहंकार और छल से दूर रहकर सच्चे मन से प्रार्थना करें। वे समझाते थे कि जिस प्रकार माँ अपने खोए हुए बच्चे के लिए रोती है, उसी प्रकार यदि साधक ईश्वर के लिए व्याकुल हो जाए, तो उसे अवश्य दर्शन होते हैं। आधे-अधूरे मन से नहीं, पूर्ण समर्पण से साधना करें। उन्होंने कहा कि सभी धर्म एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। इसलिए मतभेद नहीं, बल्कि प्रेम और सहिष्णुता को अपनाएँ। ईश्वर एक है, मार्ग अनेक हैं।
नियमित रूप से भगवान के नाम का जप मन को शुद्ध करता है और चंचलता को शांत करता है। नाम-स्मरण से भीतर भक्ति का दीपक निरंतर जलता रहता है। उन्होंने सिखाया कि संसार में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करें, पर मन को ईश्वर से जोड़े रखें। जैसे कमल का फूल पानी में रहते हुए भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही भक्त संसार में रहकर भी उससे आसक्त न हो। श्री रामकृष्ण का संदेश था- “जीव ही शिव है।” हर प्राणी में ईश्वर का अंश है। इसलिए दीन-दुखियों की सेवा करना, करुणा रखना और प्रेम से व्यवहार करना ही ईश्वर की पूजा है।
श्री रामकृष्ण ने कहा था कि अहंकार आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। जो कुछ भी करें, उसे ईश्वर को अर्पित करें। जब साधक पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तभी उसे सच्ची शांति और आनंद की अनुभूति होती है।

प्रवचन के उपरान्त मातृ गीत (भजन) की प्रस्तुति श्री अशोक मुखर्जी द्वारा दी गई तथा तबले पर उनका संगत श्री शुभम राज और खोल पर गोपाल भट्टाचार्य ने दिया। तदोपरान्त विवेकानन्द कॉलेज ऑफ नर्सिग, लखनऊ की प्राध्यापिका, सुश्री गंगा पोटाई ने ‘श्री माँ की बातें’ से पाठ किया।

रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष, स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी महाराज द्वारा ‘जगत गुरू श्री रामकृष्ण’ विषय पर प्रचवन देते हुये उन्होंने कहा कि जगतगुरु श्री रामकृष्ण किसी एक संप्रदाय के गुरु नहीं थे, बल्कि संपूर्ण मानवता के पथ-प्रदर्शक थे। श्री रामकृष्ण कहा करते थे – “ईश्वर को पाने के लिए मन को बालक जैसा सरल बनाओ।” वे स्वयं इतने निष्कपट थे कि माँ काली से बात करते समय एक छोटे बच्चे की तरह रोते, हँसते और प्रेम करते थे। उनकी भक्ति में औपचारिकता नहीं, आत्मसमर्पण था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक अर्थ है – हृदय की पवित्रता, प्रेम और करुणा। वे कहा करते थे कि जैसे अलग-अलग रास्ते एक ही गाँव तक पहुँचाते हैं, वैसे ही सभी धर्म उसी एक परमात्मा तक पहुँचते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि ईश्वर का अनुभव केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि भावना और साधना से होता है। श्री रामकृष्ण जटिल आध्यात्मिक सिद्धांतों को सरल कहानियों के माध्यम से समझाते थे, जिससे साधारण व्यक्ति भी गूढ़ सत्य को समझ सके। स्वामी विवेकानन्द ने गुरु के संदेश को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया और मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा बताया।

अन्त में स्वामी जी ने कहा कि हम अपने जीवन में प्रेम, दया और सहिष्णुता को स्थान दें, तो वही श्री रामकृष्ण की सच्ची उपासना होगी। आइए, हम अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर, निष्काम भाव से ईश्वर का स्मरण करें और प्रत्येक प्राणी में उसी परमात्मा का दर्शन करें।यही उनके जीवन का संदेश है, यही सच्चा धर्म है।

प्रवचनोपरान्त स्वामी विवेकानन्द स्तुति श्री अशोक मुखर्जी द्वारा की गयी। तत्पश्चात प्रश्नोत्तर परिचर्चा में स्वामी मुक्तिनाथानन्द एवं स्वामी कृपाकरानन्द से युवाओं ने अपने अपने प्रश्नो के उत्तर पूछे तथा अपनी जिज्ञासा को शान्त किया। आध्यात्मिक शिविर का समापन अशोक मुखर्जी के नेतृत्व में समूह में गाये श्री रामकृष्ण शरणम् गीत के साथ हुआ। तत्पश्चात उपस्थित सभी भक्तगणों, युवाओं एवं छात्राओं के मध्य प्रसाद वितरण (अन्नपूर्णा हॉल) में किया गया। उपरोक्त कार्यक्रम के सूत्रधार विवेकानन्द सेवा समिति, लखनऊ के श्री समर नाथ निगम थे।

सायं 4ः30 बजे रामकृष्ण मठ, लखनऊ के गदाधर अभ्युदय प्रकल्प के बच्चों द्वारा योगासन प्रदर्शित किया गया। स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज ने बताया कि योगासन करने से हम सभी प्रकार की बीमारियों से तथा व्याधियों से बच सकते हैं।

सायं 5:00 बजे से लखनऊ के प्रसिद्व जादूगर श्री राकेश श्रीवास्तव ने मनमोहक जादू का मंचन मंदिर सभागार में किया। जिसको देखकर लगभग 400 दर्शक मन्त्रमुग्ध हो गये। जिसमें विशेष रूप से बच्चों को मठ के अलौकिक प्रागंण में जादू की कला से साक्षात रूबरू होने का मौका मिला जिससे बच्चों ने जमकर इस जादुई कला के प्रदर्शन का आनन्द उठाया। जादूगर लोग ने ऐसे ऐसे जादूई करतब दिखाये की लोग दातो तले उगली दबाने को विवश हो गये।

सायंकाल भगवान श्री रामकृष्ण जी की संध्या आरती के पश्चात मठ में आये भक्तों के मनोरंजन हेतु एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन मंदिर सभागार में किया गया, जिसमें हल्द्वानी, उत्तराखण्ड के जाने माने सरोद वादक श्री स्मित तिवारी ने प्रस्तुति दी स्मित तिवारी 5 साल की छोटी उम्र में अपनी माँ श्रीमती छाया तिवारी से ध्रुपद और तबला सीखना शुरू किया। 8 साल की उम्र में स्मित ने अपने पिता पंडित चंद्रशेखर तिवारी से गुरु शिष्य परंपरा के तहत सरोद सीखना शुरू किया, जो मैहर घराने के पंडित सुप्रभात पाल के शिष्य थे। अभी, वह अपने पिता के मार्गदर्शन में सरोद सीख रहे हैं तथा अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए है।
कार्यक्रम में उन्होंने सर्वप्रथम राग झिंझोटी जिसमें बिलम्बित तीन ताल, मध्यलय तीन ताल व ध्रुत तीन ताल बजाकर उन्होंने मनमोहक प्रस्तुति दी।
उस दौरान तबले पर संगत लखनऊ के जाने माने तबला वादक श्री अरूणेश पाण्डेय ने दिया जिससे वहाँ पर उपस्थित भक्तगण भक्ति में भाव में भावविभोर हो गये।

तत्पश्चात मुख्य मंदिर के पूर्व प्रांगण में रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंदजी के नेतृत्व में मनमोहक आतिशबाजी के उपरान्त उपस्थित सभी भक्तों को प्रसाद वितरण करते हुये भगवान श्री रामकृष्ण देव जी का 190वां जन्मोत्सव का समापन हुआ।

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