उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी एवं चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ स्मृति में सोमवार 22 दिसम्बर, 2025 को एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दी भवन के निराला सभागार लखनऊ में पूर्वाह्न 10.30 बजे से किया गया। दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के उपरान्त वाणी वंदना सुश्री सरोज खुल्बे द्वारा प्रस्तुत की गयी। सम्माननीय अतिथि— डॉ० सुरेन्द्र विक्रम, डॉ0 नागेश पाण्डेय ‘संजय’ एवं डॉ० रजनीकान्त शुक्ल का स्वागत उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर डॉ० अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया ।
डॉ0 सुरेन्द्र विक्रम ने कहा- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कविताएँ बाल मन को आह्लादित कर देती हैं। उनकी कविताएँ हमें भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं। ‘बाल गीतायन’ माहेश्वरी जी की काव्य रचनाओं का एक महत्वपूर्ण संग्रह है। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी बाल साहित्य में महनीय व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने बाल साहित्य को काफी समृद्ध किया। उनकी साहित्यिक उपलब्धियाँ एक दस्तावेज के रूप में हमारे सम्मुख हैं । वे सहज, सजग व खरे स्वभाव के थे। वे बालक को परम हंस की श्रेणी में रखने वाले रचनाकार थे। बाल साहित्य जगत में उनकी दृष्टि व्यापक थी ।

डॉ0 नागेश पाण्डेय ‘संजय’ ने कहा- यदि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी साहित्य जगत के सूर्य थे तो चन्द्र पाल सिंह यादव ‘मयंक’ बाल साहित्य जगत के चन्द्र थे । मयंक जी ने विविध विषयक स्वरूपों में साहित्य की रचना की। उन्होंने बाल साहित्य को संस्कारों से जोड़ने का कार्य किया। मयंक जी बाल साहित्य के नींव के पत्थर के समान थे। “कंटीली है जाड़े की रात’ मयंक जी की प्रसिद्ध रचना है । मयंक जी बाल साहित्य की रचनाओं में बालमन को स्पर्श करते हैं। बच्चे उनकी रचनाओं को पढ़कर झूमने लगते हैं। मयंक जी का लेखन समसामायिक था। मयंक जी ने बाल साहित्य को समादृत किया।
डॉ0 रजनीकान्त शुक्ल ने कहा- चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ जी शिशुगीत व बालगीत लिखते समय वे बच्चों में घुल-मिल जाते हैं। रचनाकार जो भी समाज में देखता है, वही अपनी रचनाओं में उद्धृत करता है । मयंक जी की रचनाओं में उनका साहित्य झलकता है। मयंक जी का व्यक्तित्व पारस जैसा था । “यहाँ सुमन विखरे दो’ रचना में उनके जीवन के सम्बन्ध में काफी रोचक प्रसंग संग्रहीत हैं। मयंक जी के शिशुगीतों में बच्चों को प्रेरित करने वाली कविताओं का संग्रह है। उनकी कविताओं में बच्चों की मस्ती भरपूर दिखायी देती है। मयंक जी का मन सरल, सहज व बच्चों जैसा ही था ‘मयंक’ जी ने यात्रा वर्णन भी लिखा। उनकी रचनाओं में विविधता दिखायी देती है।
इस अवसर पर द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की रचना “बढ़े चलो’, “मुन्नी- मुन्नी’ एवं चन्द्रपाल सिंह यादव “मयंक” की रचना “रानी बिटिया”, “जग को स्वर्ग बनाना है’ का रचनापाठ सुश्री ज्योति गुप्ता द्वारा किया गया तथा द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की रचना “हम सब सुमन एक उपवन के”, “जलाते चलो’ एवं चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ की कहानी “परीक्षा” का पाठ सुश्री शिखा वर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया । डॉ० अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उ०प्र० हिन्दी संस्थान द्वारा कार्यक्रम का संचालन एवं संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया गया।
