डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ अध्ययन संस्थान, लखनऊ ‘निशंक’ जी एक संस्था – इतिहास पुरुष थे

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

लखनऊ। आज दिनांक 29 अक्टूबर, 2025 को डॉ० लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ की 107वीं जयन्ती के अवसर पर निराला सभागार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के सभागार में वरिष्ठ कवि श्री उदय प्रताप सिंह की अध्यक्षता एवं मुख्य अतिथि श्री आत्म प्रकाश मिश्र की उपस्थिति में डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ साहित्य सम्मान-2025 ́ से वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित, लखनऊ को तथा ‘विद्या मिश्र लोक संस्कृति सम्मान-2025’ से श्री ललित सिंह पोखरिया, लखनऊ को सम्मानित करते हुए प्रत्येक को ग्यारह – ग्यारह हजार रुपये की धनराशि, अंगवस्त्र, प्रतीक चिह्न व प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया ।

सभा अध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि का उत्तरीय एवं उपहार भेंट कर स्वागत, संस्थान के अध्यक्ष डॉ० कमलाशंकर त्रिपाठी एवं श्री योगीन्द्र द्विवेदी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और ‘निशंक’ अध्ययन संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुये इसी प्रकार का आयोजन एवं पुस्तकों के प्रकाशन का भी आश्वासन दिया। अभ्यागतों का स्वागत डॉ. निशंक संस्थान के अध्यक्ष डॉ. कमलाशंकर त्रिपाठी द्वारा किया गया।

‘डॉ. निशंक साहित्य सम्मान’ से सम्मानित प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा निशंक जी की स्मृति में मनभाव-विभोर हो जाता है। वे मेरे गुरु तो नहीं थे किन्तु गुरु जैसे ही थे। मुझे उनसे सदैव प्रेरणा मिलती रही। सुकवि विनोद को अजर-अमर बनाने में उनका सबसे बड़ा योगदान था। निशंक जी जीते-जागते इतिहास थे। निशंक जी का परिवार साधुवाद का पात्र हैं। इस अवसर पर उन्होंने श्रीमती विद्या मिश्र को भी नमन किया । निशंक जी ब्रजभाषा अवधी और हिन्दी सवैया के सिद्धहस्त कवि थे ।

‘विद्या मिश्र लोक संस्कृति सम्मान’ से सम्मानित श्री ललित सिंह पोखरिया ने कहा मेरी लोकमंच की यात्रा 1986 से शुरू हुई । मैं अविभाजित उ०प्र० का पुत्र हूँ। मैंने भी अनेक बड़े-बड़े लोक रंग कर्मियों की तरह लोक गीता के मंचन का कार्य किया । लोक कलाओं के प्रति अनुसूचित जनजातियों के समाज में गौरव गान जगाने का कार्य किया। मैं ग्लैमर की दुनिया में न जाकर लोक संस्कृति को चुना ।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री आत्म प्रकाश मिश्र ने कहा कुछ लोग हर जन्म में किसी न किसी रूप में मिलते हैं। निशंक जी हमारे पिता तुल्य थे। 8 दशक तक निशंक जी ने साहित्य साधना की ऐसे विरले ही लोग होते हैं। राना बेनी माधव की प्रस्तुति निशंक जी ने बहुत ही सुन्दर-ढंग से की है । निशंक जी की रचनाएँ मृत में भी प्राण डाल देती हैं

समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि श्री उदय प्रताप सिंह ने कहा निशंक जी से मैं कई बार मिला था। वे एक ऐसी मशाल थे जो पहाड़ की ऊचाई पर बैठे थे और लोगों को दिशा प्रदान करते थे। वे तो ब्रहमलीन हो गये किन्तु उनके पुत्रों ने उस मशाल को मजबूती से थाम रखा है। इस मौके पर आपने ‘रमई काका और शिशु जी को भी याद किया। कवियों ने स्वतंत्रा संग्राम में आम लोगो की तरह भाग लिया । निशंक जी कविता और कक्षा दोनों में सदैव अनुशासन रखा ।
इस अवसर पर पं. चन्द्र भूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’ का पुण्य स्मरण करते हुए उनकी कतिपय रचनाओं का पाठी श्री अलिन्द त्रिवेदी द्वारा किया गया तथा श्री हरिमोहन बाजपेयी ‘माधव’ ने अपनी तथा निशंक जी की रचनाओं का पाठ किया ।
समारोह का संचालन डॉ. योगेश ने किया । धन्यवाद प्रो. उषा सिन्हा ने दिया ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *