नई दिल्ली : दूसरे विश्वयुद्ध के समय जब जापान और जर्मनी अपने उठान पर था. पश्चिमी ताकत मिलकर भी जापान पर कंट्रोल हासिल नहीं कर पा रही थीं. हालात को देखते हुए अमेरिका ने एक सीक्रेट प्लान पर काम कर रहा था. इसका नाम ‘मैनहटन प्रोजेक्ट’ रखा गया था. इसके तहत अमेरिका ने एटम बम बनाने में सफलता हासिल कर ली. जापान ने जब USA के पर्ल हार्बर पर अटैक किया तो अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर बम पटक दिया.
धमाके से जब मशरूम जैसे शोले निकले तो उसमें जापान के मंसूबे जलकर खाक हो गए. वहीं, अमेरिका का हौसला सातवें आसमान पर चला गया. उसी तरह चीन ने अब अपना ‘मैनहटन प्रोजेक्ट’ लॉन्च कर वॉशिंगटन समेत तमाम पश्चिमी ताकतों को हैरत में डाल दिया है. चीन के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने वो कर दिखाया है, जिसे रोकने में अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी.
अमेरिका सालों तक चीन को रोकने की कोशिश करता रहा और बीजिंग दशकों से आगे बढ़ने की जद्दोजहद करता रहा. आखिरकार ड्रैगन ने वो कर दिखाया, जिसपर फिलहाल अमेरिका और वेस्टर्न पावर्स की मोनोपोली है. चीन ने कटिंग एज सेमीकंडक्टर चिप बनाने वाली मशीन को डेवपल करने में कामयाबी हासिल कर ली है. साल 2025 के शुरुआत में इस मशीन को डेवलप कर लिया गया था और अब उसका ट्रायल किया जा रहा है.
सेमीकंडक्टर चिप वो बला है, जो AI टेक्नोलॉजी को और ताकत देगा. अल्ट्रा मॉडर्न फाइटर जेट से लेकर मिसाइल और स्मार्टफोन बनाने की राह आसान हो जाएगी. इतना ही नहीं, चीन इसकी मदद से फाइटर जेट्स और मिसाइल्स को न केवल तबाह करने में सक्षम होगा, बल्कि उसे मिशन के बीच में जाम भी कर सकेगा.
रिपोर्ट के अनुसार, शेनझेन की एक हाई-सिक्योरिटी लैब में चीन ने वह काम कर दिखाया है, जिसे रोकने के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देश सालों से कोशिश कर रहे थे. यहां चीनी वैज्ञानिकों ने एक ऐसी मशीन का प्रोटोटाइप तैयार किया है, जो अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप बनाने में सक्षम मानी जाती है. यही चिप्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), स्मार्टफोन और आधुनिक हथियारों की रीढ़ हैं. यह प्रोटोटाइप 2025 की शुरुआत में पूरा हुआ और अब परीक्षण के दौर से गुजर रहा है. यह मशीन इतनी बड़ी है कि लगभग पूरी फैक्ट्री का एक फ्लोर घेर लेती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, इसे उन इंजीनियरों की टीम ने तैयार किया है, जो पहले नीदरलैंड की दिग्गज कंपनी ASML में काम कर चुके हैं. ASML दुनिया की एकमात्र कंपनी है, जो अत्याधुनिक EUV (एक्सट्रीम अल्ट्रावॉयलेट) लिथोग्राफी मशीन बनाती है. इन इंजीनियरों ने ASML की तकनीक को रिवर्स-इंजीनियरिंग के जरिए समझकर यह प्रोटोटाइप बनाया है. EUV मशीनें आज की टेक्नोलॉजिकल कोल्ड वॉर के केंद्र में हैं. ये मशीनें बेहद बारीक अल्ट्रावॉयलेट रोशनी (Ultraviolet Rays) से सिलिकॉन वेफर पर सर्किट उकेरती हैं. ये सर्किट इंसानी बाल से भी हजारों गुना पतले होते हैं. सर्किट जितने छोटे होते हैं, चिप उतनी ही ताकतवर बनती है. अभी तक यह क्षमता सिर्फ पश्चिमी देशों के पास थी.
सेमीकंडक्टर चिप्स क्यों इतना अहम?
हर आधुनिक तकनीक की जान: मोबाइल फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, टीवी, वॉशिंग मशीन, कार और स्मार्ट डिवाइस – सबकुछ सेमीकंडक्टर चिप्स पर चलता है. इनके बिना कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण काम नहीं कर सकता.
डिजिटल और AI युग की रीढ़: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), 5G नेटवर्क, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा सेंटर जैसे आधुनिक सिस्टम तेज और ताकतवर चिप्स पर निर्भर हैं. जितनी बेहतर चिप, उतनी तेज तकनीक.
देश की सुरक्षा और रक्षा में जरूरी: मिसाइल सिस्टम, रडार, फाइटर जेट, ड्रोन और साइबर सुरक्षा में सेमीकंडक्टर चिप्स का बड़ा रोल होता है. इसलिए चिप्स की कमी सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है.
आर्थिक विकास और उद्योग से जुड़ा मामला: ऑटोमोबाइल, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी उद्योग चिप्स पर निर्भर हैं. चिप्स की सप्लाई रुकने से फैक्ट्रियां बंद हो सकती हैं और अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है.
तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक ताकत: जो देश खुद चिप्स बनाता है, वह तकनीक में आत्मनिर्भर होता है और दूसरे देशों पर कम निर्भर रहता है. इसी वजह से अमेरिका, चीन और भारत जैसे देश सेमीकंडक्टर पर खास जोर दे रहे हैं.
अनुमान से भी आगे निकला चीन
सूत्रों के अनुसार, चीन की यह मशीन EUV रेज या लाइट्स पैदा करने में सफल हो चुकी है, लेकिन अभी इससे काम करने वाली चिप तैयार नहीं हुई है. अप्रैल 2025 में ASML के सीईओ क्रिस्टोफ फुके ने कहा था कि चीन को ऐसी तकनीक विकसित करने में ‘कई साल’ लगेंगे, लेकिन इस प्रोटोटाइप के सामने आने से साफ है कि चीन उम्मीद से कहीं तेजी से सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है. हालांकि, चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं. सबसे बड़ी दिक्कत उन बेहद सटीक ऑप्टिकल सिस्टम्स की नकल करना है, जो पश्चिमी कंपनियां बनाती हैं. फिर भी पुराने ASML मशीनों के पुर्जे सेकेंडरी मार्केट से मिलने के कारण चीन को यह प्रोटोटाइप बनाने में मदद मिली. सरकार का लक्ष्य 2028 तक इस मशीन से काम करने वाली चिप तैयार करना है, लेकिन प्रोजेक्ट से जुड़े लोग 2030 को ज्यादा वास्तविक समयसीमा मानते हैं. इसके बावजूद यह वह समय है, जो विशेषज्ञों के अनुमान से काफी पहले है.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सपना और ‘मैनहटन प्रोजेक्ट’
यह सफलता चीन की उस छह साल पुरानी सरकारी पहल का नतीजा है, जिसका मकसद सेमीकंडक्टर में आत्मनिर्भर बनना है. यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग की शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल है. हालांकि चीन के सेमीकंडक्टर लक्ष्य सार्वजनिक रहे हैं, लेकिन शेन्ज़ेन का EUV प्रोजेक्ट पूरी तरह गोपनीय रखा गया. यह परियोजना चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल साइंस एंड टेक्नोलॉजी कमीशन के तहत चल रही है, जिसकी कमान शी जिनपिंग के करीबी डिंग श्वेइशियांग के हाथ में बताई जाती है. इस पूरे नेटवर्क में चीनी टेक दिग्गज Huawei की अहम भूमिका है. Huawei देशभर की कंपनियों और सरकारी रिसर्च संस्थानों को जोड़ने का काम कर रही है. हजारों इंजीनियर इस मिशन में लगे हैं. इसे चीन का ‘मैनहटन प्रोजेक्ट’ कहा जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम बनाने के लिए किया था. एक सूत्र के मुताबिक, लक्ष्य साफ है – चीन ऐसी उन्नत चिप बनाना चाहता है, जो पूरी तरह देश में बनी मशीनों पर तैयार हों और अमेरिकी सप्लाई चेन से पूरी तरह आज़ाद हों.
