बुर्का-घूंघट विवाद : बिहार में नीतीश से पहले राजस्थान में गहलोत भी कर चुके हैं ऐसी हरकत

बिहार राज्य

जयपुर : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक सार्वजनिक कार्यक्रम में महिला का बुर्का हटाने का मामला अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने देशभर में सांस्कृतिक और सामाजिक बहस को हवा दे दी है. विपक्ष जहां इसे महिलाओं की गरिमा से जोड़कर सवाल उठा रहा है, वहीं समर्थक इसे रूढ़ियों से मुक्ति का प्रतीक बता रहे हैं.हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब किसी मुख्यमंत्री के इस तरह के कदम पर विवाद खड़ा हुआ हो. इससे पहले राजस्थान में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी एक महिला का घूंघट हटाकर सुर्खियों में आ चुके हैं. उस समय इसे सामाजिक सुधार से जोड़कर पेश किया गया था.

नीतीश कुमार के इस कदम के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि क्या किसी भी व्यक्ति, चाहे वह मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, को सार्वजनिक मंच पर किसी महिला के पहनावे में हस्तक्षेप करने का अधिकार है. राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिल रही है. राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक कार्यक्रम के दौरान महिला का घूंघट हटाते नजर आए थे. उस समय इसे ग्रामीण महिलाओं को रूढ़िवादी परंपराओं से मुक्त करने की कोशिश के रूप में पेश किया गया था. हालांकि भाजपा ने उस वक्त सांसद और वर्तमान में राजस्थान के उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने सीएम अशोक गहलोत पर निशाना साधा था। राज्यवर्धन ने ट्वीट किया था कि कांग्रेस के सीएम को जबरदस्ती महिलाओं का घूंघट हटाना है, लेकिन उनकी बुर्के पर बोलती बंद हो जाती है.

संयम लोढ़ा ने घूंघट प्रथा के खिलाफ खोला था मोर्चा
राजस्थान में यह मुद्दा तब और गहरा गया था, जब उस वक्त के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सलाहकार और वर्तमान विधायक संयम लोढ़ा ने घूंघट प्रथा के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया था. लोढ़ा ने घूंघट को महिलाओं पर थोपा गया सामाजिक बोझ बताते हुए इसे समाप्त करने के लिए अभियान शुरू किया था. उन्होंने घोषणा की थी कि जो पंचायत स्वयं को ‘घूंघट मुक्त पंचायत’ घोषित करेगी, उसे विधायक कोष से 25 लाख रुपये की राशि प्रदान की जाएगी. इस घोषणा ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी थी. समर्थकों का तर्क था कि यह पहल महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ठोस कदम है, जबकि विरोधियों ने इसे महिलाओं की निजी पसंद और सामाजिक परंपराओं में दखल करार दिया. कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस अभियान का समर्थन भी मिला, वहीं कुछ जगहों पर इसका विरोध भी हुआ.

एक बार फिर बुर्का विवाद बन गया है राजनीति का केंद्र

अब नीतीश कुमार के बुर्का हटाने के विवाद के बाद राजस्थान की यह पुरानी घटना फिर से चर्चा में आ गई है. सियासी लड़ाई कम होने के आसार नहीं दिख रहे. सवाल उठ रहा है कि क्या बुर्का और घूंघट जैसे विषयों को राजनीतिक मंचों से इस तरह उठाना सही है? ।इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि महिलाओं से जुड़े सामाजिक प्रतीकों पर राजनीति करना आसान तो है, लेकिन समाधान निकालना उतना ही जटिल. अब देखना यह होगा कि यह बहस केवल बयानबाजी तक सीमित रहती है या वास्तव में समाज में किसी बदलाव की दिशा तय करती है.

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