सोने की कीमतें गिरते ही RBI ने गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों की बढ़ाई टेंशन

बाजार बुलेटिन

नई दिल्ली : रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बैंकों और एनबीएफसी (NBFCs) के गोल्ड लोन पोर्टफोलियो पर अपनी निगरानी काफी सख्त कर दी है. इस अचानक बढ़ी सख्ती के पीछे सबसे बड़ी वजह 30 जनवरी 2026 के बाद से सोने की कीमतों में आई 15% की भारी गिरावट है. दरअसल, पिछले कुछ समय में सोने की बढ़ती कीमतों की वजह से गोल्ड लोन के बाजार में जबरदस्त उछाल देखा गया था, लेकिन अब कीमतों में आई इस अचानक कमी ने कर्ज देने वाले संस्थानों के लिए जोखिम बढ़ा दिया है.

आरबीआई यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सोने के दाम गिरने से बैंकों और फाइनेंस कंपनियों की एसेट क्वालिटी पर बुरा असर न पड़े. जब सोने की कीमतें गिरती हैं, तो कर्ज की राशि और गिरवी रखे सोने की वैल्यू का अनुपात (LTV) गड़बड़ा जाता है. इसी चिंता के बीच शेयर बाजार में मुथूट फाइनेंस और मणप्पुरम फाइनेंस जैसी दिग्गज गोल्ड लोन कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई है.

कीमतों में गिरावट से बढ़ा रिस्क
के पीछे कई अहम कारण और संभावित खतरे हैं, जिन्हें समझना जरूरी है:
LTV रेशियो का खतरा: नियमों के मुताबिक गोल्ड लोन की वैल्यू गिरवी रखे सोने के दाम के 75% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. सोने के दाम 15% गिरने से कई पुराने लोन इस सीमा को पार कर सकते हैं, जिससे डिफॉल्ट का खतरा बढ़ जाता है.

पोर्टफोलियो की कृत्रिम ग्रोथ: पिछले साल गोल्ड लोन पोर्टफोलियो में जो बढ़त दिखी थी, वह नए ग्राहकों से ज्यादा सोने की बढ़ती कीमतों की वजह से थी. अब कीमतें गिरने से यह ‘बैलून’ पिचकने का डर है.
सख्त नियमों की तैयारी: 1 अप्रैल 2026 से आरबीआई के नए दिशा-निर्देश लागू होने वाले हैं. इसमें शुद्धता के मानकों और समय-समय पर वैल्यूएशन की मॉनिटरिंग को लेकर बहुत कड़े नियम बनाए गए हैं.

कर्ज देने वाले संस्थानों पर क्या होगा असर?
इस निगरानी का असर सीधे तौर पर उन कंपनियों पर पड़ेगा जिनका पूरा बिजनेस गोल्ड लोन पर टिका है. आरबीआई अब इन संस्थानों से डेटा मांग सकता है या उनके पोर्टफोलियो का स्ट्रेस टेस्ट कर सकता है. अगर कीमतें इसी तरह अस्थिर रहीं, तो कंपनियों को ग्राहकों से अतिरिक्त मार्जिन या सोना जमा करने को कहना पड़ सकता है.

बाजार के जानकारों का मानना है कि आरबीआई की यह सक्रियता भविष्य में किसी बड़े वित्तीय संकट को टालने के लिए है. खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जहां गोल्ड लोन बहुत लोकप्रिय है, वहां कर्जदारों और कंपनियों के बीच तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती होगी.

सोने की कीमतों में आई 15% की अचानक गिरावट ने आरबीआई को सतर्क कर दिया है, जिसके बाद बैंकों और एनबीएफसी के गोल्ड लोन पोर्टफोलियो की कड़ी निगरानी शुरू कर दी गई है. आरबीआई का मुख्य उद्देश्य गिरती कीमतों की वजह से बैंकों के फंसे हुए कर्ज (NPA) को बढ़ने से रोकना है. इस खबर के बाद गोल्ड लोन सेक्टर की कंपनियों के शेयरों में हलचल तेज हो गई है. 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले नए नियम और मौजूदा मॉनिटरिंग यह संकेत देते हैं कि आने वाले समय में गोल्ड लोन लेना और देना, दोनों ही अधिक कड़े नियमों के दायरे में होंगे.

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