अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमेन्स एसोसिएशन (ऐपवा) ने आज लखनऊ में चंद्रिका देवी गेट से अस्सी क्रॉसिंग तक एक मार्च आयोजित किया। इस मार्च में बड़ी संख्या में महिलाओं, कामकाजी महिलाओं, छात्राओं और स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया और महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा, कामकाजी महिलाओं के अधिकारों तथा न्याय की मांग को बुलंद किया।
मार्च के दौरान प्रतिभागियों ने जोरदार नारे लगाए, जिनमें प्रमुख रूप से
“तेरी शक्ति मेरी शक्ति, सबकी शक्ति ज़िंदाबाद”
और
“बलात्कारियों को बेल नहीं, जेल दो”
जैसे नारे शामिल थे।

सभा को संबोधित करते हुए ऐपवा की सहयोज़क सरोजिनी बिष्ट ने कहा कि आज देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सरकार का रवैया बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा:
“मोदी–योगी सरकार एक तरफ महिलाओं की सुरक्षा की बातें करती है, लेकिन दूसरी तरफ ऐसे कदम सामने आते हैं जिनसे बलात्कार के दोषियों और आरोपियों को संरक्षण मिलता दिखाई देता है। राम रहीम और आसाराम बापू जैसे मामलों से लेकर बिलकिस बानो के दोषियों की रिहाई और कुलदीप सिंह सेंगर तथा बृजभूषण शरण सिंह जैसे मामलों में सत्ता का रवैया यह सवाल खड़ा करता है कि महिलाओं को न्याय कैसे मिलेगा।”
कमला गौतम, ऐपवा ने अपने संबोधन में स्कीम वर्करों और कामकाजी महिलाओं की स्थिति पर बात करते हुए कहा:
“आज महिलाएँ समाज और अर्थव्यवस्था दोनों को संभाल रही हैं, लेकिन उन्हें उसका सम्मान या अधिकार नहीं मिलता। घर की पूरी जिम्मेदारी भी महिलाओं पर होती है और बाहर काम करने के बावजूद उन्हें कम वेतन और असुरक्षित परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। यह दोहरा बोझ महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय को दिखाता है।”
राम देवी, ऐपवा ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा, विशेषकर घरेलू हिंसा, के सवाल को उठाते हुए कहा:
“घरेलू हिंसा को अक्सर ‘घर का मामला’ कहकर दबा दिया जाता है, जबकि यह महिलाओं के खिलाफ सबसे व्यापक हिंसा का रूप है। बहुत सी महिलाएँ अपने ही घरों में हिंसा और डर के माहौल में जीने को मजबूर हैं। यह स्थिति बदलनी होगी और महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित करना होगा।”
कमलेश, ऐपवा ने अपने संबोधन में महिलाओं के ऐतिहासिक संघर्षों को याद करते हुए कहा:
“8 मार्च का इतिहास कामकाजी महिलाओं के लंबे और साहसी संघर्षों से जुड़ा है। महिलाओं को जो भी अधिकार आज हासिल हुए हैं, वे संगठित संघर्षों का परिणाम हैं। आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि हम उस संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाएँ और बराबरी, न्याय और सम्मान की लड़ाई को और मजबूत करें।”
मार्च के अंत में वक्ताओं ने आह्वान किया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा, आर्थिक शोषण और बलात्कारियों को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण के खिलाफ संघर्ष को और तेज किया जाएगा तथा एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए आवाज उठाई जाएगी जहाँ महिलाएँ भय और भेदभाव से मुक्त होकर सम्मान के साथ जीवन जी सकें।
