आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं सुमित्रानंदन पंत स्मृति समारोह

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं सुमित्रानंदन पंत स्मृति समारोह के शुभ अवसर पर दिन गुरुवार 22 मई 2025 को एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दी भवन के निलयालय समारागार में पूर्वाहन 11.00 बजे से किया गया। दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्जन के उपरान्त वाणी वंदना श्रीमती सरोज खनूजे द्वारा प्रस्तुत की गई।

 

सम्माननीय अतिथि- डॉ० सूर्य प्रसाद दीक्षित, डॉ० रविनन्दन सिंह, डॉ० दिनेश सेन सिंह, बलजीत श्रीवास्तव का स्वागत स्मृति चिन्ह भेंट कर श्री जितेन्द्र कुमार, अपर मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का किया गया।

 

डॉ० सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी को साहित्यिक पातावरण विरासत में मिला। कई मापदण्डों के तहत सूर्य कान्ति त्रिभागी निराला जी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी को “आचार्य” की उपाधि दी। महावीर प्रसाद द्विवेदी स्वाध्यायी प्रवृत्ति के थे। उन्होंने “सरस्वती” पत्रिका का काफी समय तक सम्पादन किया। उनका जीवन सदैवपूर्ण था। “सरस्वती” पत्रिका को उन्होंने प्रत्येक बौद्धिक वर्ग से जोड़ने का प्रयास किया। इस पत्रिका को उन्होंने लोकप्रिय बनाने के लिए काफी प्रयास किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य के युग-निर्माण का कार्य किया। एक निष्ठावान, कर्मनिष्ठ, समय को प्रति प्रतिद्वन्दिता आदि गुणों से महावीर प्रसाद द्विवेदी जी परिपूर्ण थे। उन्होंने अधिक पुरातनता से बचने का सुझाव दिया।

 

डॉ० रविनन्दन सिंह ने कहा- साहित्य संसार की एक अलग दुनिया होती है। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के जीवन में संयमबद्धता का काफी महत्व था। उनके जीवन का उद्देश्य था कि साधन नहीं साधना महान है। महावीर प्रसाद द्विवेदी एक युग प्रवर्तक रचनाकार सम्पादक थे। यह बात निर्विवाद है कि साहित्य की ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के बिना सम्पादन कार्य नहीं किया जा सकता। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य के मार्गदर्शन किया।

 

डॉ० दिनेश सेन सिंह ने कहा- पंत जी छायावाद के चरम कवि रहे। उनकी रचनाएं छायावाद, रहस्यवाद के तत्वों से परिपूर्ण हैं। प्रगतशील रचनाकारों पंत जी की आलोचना भी की।

 

उनकी स्वर्ण किरण, शार्दुलावली काव्य रचना काफी चर्चित रही। पंत की रचना श्याम में भाषा की उत्कृष्टता मिलती है। पंत जी की रचनाओं में विचारों व भाषा में निरन्तर परिवर्तन होने के कारण उनके प्रशंसक धीरे-धीरे आलोचक होते गये। “सिद्धार्थ” में पंत जी ने दार्शनिक तत्वों का समावेश किया।

 

डॉ० बलजीत श्रीवास्तव ने कहा- सुमित्रानंदन पंत भारत की संस्कृति के सवाहक रहे। पंत जी अपने काव्य के माध्यम से समय-समय पर लोकायतन से लोक चेतना की तरफ अग्रसर होते हैं और अपनी प्रतिभाओं का विस्तार करते हुए सुमित्रानंदन पंत कविता की रचना करते हैं। पंत जी आधुनिक चेतना के प्रतीक हैं। उनकी काव्य रचना में प्राकृतिक तत्व उपस्थित है। पंत जी ने प्रकृति को ही सब कुछ माना। पंत जी पर बंगाली भाषा का भी प्रभाव पड़ा। पंत जी बचपन से ही सुकुमार छवि के थे। पंत जी पर मार्क्स का भी प्रभाव पड़ा।

 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के अपर मुख्य सचिव महोदय जी ने कहा- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं सुमित्रानंदन पंत की रचनाएं शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं सुमित्रानंदन पंत स्मृति समारोह के भव्य आयोजन के लिए शुभकामनाएं।

 

डॉ० अमिता दूबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा कार्यक्रम का संचालन एवं संगोष्ठी में उपस्थित समस्त सचिवगणों, विद्वत्ताओं एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया गया।

 

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