नन्द दुलारे वाजपेयी, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ एवं वंशीधर शुक्ल स्मृति समारोह

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

दिनांक 31 अगस्त, 2026 उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा नन्द दुलारे वाजपेयी, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ एवं वंशीधर शुक्ल की स्मृति में सोमवार दिनांक 31 अगस्त, 2026 को एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दी भवन के प्रेमचन्द सभागार में पूर्वाह्न 10:30 बजे से किया गया।
दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के उपरान्त वाणी वंदना डॉ० प्रीति राव द्वारा प्रस्तुत की गयी ।
सम्माननीय अतिथि— डॉ० कैलाश देवी सिंह, श्री पद्मकान्त शर्मा ‘प्रभात’ एवं डॉ0 सत्यवान का स्वागत उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर डॉ० अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा किया गया।
डॉ० कैलाश देवी सिंह ने कहा- वंशीधर शुक्ल जी एक कालजयी रचनाकार हैं। शुक्ल जी ने देश की स्वतंत्रता में भी योगदान दिया। वे किसानों की समस्याओं के निराकरण के लिए भी अपनी लेखनी चलायी। उन्होंने जीवन मूल्यों व आदर्शों के साथ कभी समझौता नहीं किया। वे स्वाभिमानी प्रवृत्ति के लेखक थे। शुक्ल जी की रचना बिन्दु में गाँव की प्राथमिकता रही है। वे गाँव व किसानों के पक्षधर थे। वे समाज में फैली दहेज प्रथा के घोर विरोधी थे। उनके काव्य में गाँव व किसानों की समस्याओं का व्यापक वर्णन मिलता है। उनकी रचनाओं में किसानों की दृर्दशा परिलक्षित होती है। उन्होंने कल्पनावाद के कवियों की घोर निन्दा की है।\

श्री पद्मकान्त शर्मा ‘प्रभात’ ने कहा- गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही जी की रचनाएं राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत हैं। उनकी मान्यता थी कि जिसके हृदय में स्वदेश का प्यार नहीं वह हृदय नहीं वह पत्थर के समान हैं। गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही जी एक कवि निर्माता के रूप में साहित्य जगत में प्रसिद्ध हैं। सनेही जी ने राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत कविताएं लिखीं। वे छन्दबद्ध ओजस्वी कविताएं लिखते थे। सनेही जी एक युग दृष्टा कवि के रूप में साहित्य जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, मातृभूमि को केन्द्र बिन्दु के रूप में रखा।
डॉ० सत्यवान ने कहा- साहित्य में आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आलोचना के क्षेत्र में नन्द दुलारे वाजपेयी स्वतंत्र विचारों के पक्षधर थे। नन्द दुलारे वाजपेयी मौलिक रचनाकारों की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। उनकी रचनाएँ सारगर्भित हैं। उनकी सम्पादकीय टिप्पणियाँ भी विभिन्न क्षेत्रों में प्रखर आलोचना से परिपूर्ण हैं। उनकी मान्यता थी कि साहित्य ही समाज का सही मार्गदर्शन कर सकता है।

इस अवसर पर रतन माला भारती द्वारा नन्द दुलारे वाजपेयी के निबन्ध ‘गीतिका’, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की कविता परिचय एवं पावस गीत का वाचन किया गया। वहीं राधिका रावत द्वारा नन्द दुलारे वाजपेयी के निबन्ध श्री रामचन्द शुक्ल तथा वंशीधर शुक्ल की कविता ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई एवं संसार किसी के साथ नही चलता है का वाचन भी हुआ ।
डॉ० अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उ०प्र० हिन्दी संस्थान द्वारा कार्यक्रम का संचालन एवं संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *