नई दिल्ली : द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के आठ दशक बाद भी उसकी क्षेत्रीय विरासत को लेकर रूस और जापान के बीच कूटनीतिक जंग तेज हो गई है। प्रशांत महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कुरील द्वीप समूह (जापान द्वारा ‘उत्तरी क्षेत्र’ के रूप में संदर्भित) के इतुरुप (एतोरोफु) द्वीप पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ऐतिहासिक यात्रा ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच दशकों पुराने विवाद को एक बार फिर से भड़का दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण के बाद से यह पहला मौका है जब रूसी राष्ट्रपति ने इस विशेष विवादित दक्षिणी द्वीप का दौरा किया है।
इस कदम की जापान सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने पुतिन की इस यात्रा की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे “पूर्णतः अस्वीकार्य” करार दिया। टोक्यो का तर्क है कि ये द्वीप ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय कानून, दोनों ही दृष्टि से जापान की संप्रभु भूमि का अभिन्न हिस्सा हैं। जापानी विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने स्पष्ट किया कि यूक्रेन संकट के कारण पहले से ही संवेदनशील बने दोनों देशों के रिश्तों में यह दौरा एक और गंभीर झटका है।
जापान के विरोध से नाराज मॉस्को ने त्वरित कार्रवाई करते हुए टोक्यो के राजदूत अकीरा मुतो को रूसी विदेश मंत्रालय में तलब किया। रूस के उप-विदेश मंत्री मिखाइल गलुज़िन ने जापानी नेतृत्व के बयानों को “रूस-विरोधी” बताते हुए औपचारिक विरोध दर्ज कराया। मॉस्को ने दोहराया कि 1945 के याल्टा समझौते और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत दक्षिणी कुरील द्वीपों पर रूस की संप्रभुता अंतिम और अटूट है। रूस ने चेतावनी दी कि पश्चिमी प्रतिबंधों का समर्थन करने वाले टोक्यो के रुख के खिलाफ उसे कड़े जवाबी कदम उठाने का पूरा अधिकार है।
गौरतलब है कि अगस्त 1945 में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लगभग 17,000 जापानी नागरिकों को बेदखल कर दिया था। इस अनसुलझे क्षेत्रीय विवाद के कारण ही दोनों देशों ने आज तक द्वितीय विश्व युद्ध के औपचारिक अंत का शांति समझौता (Peace Treaty) नहीं किया है। हाल के वर्षों में रूस द्वारा इस क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बढ़ाने से कूटनीतिक समाधान की गुंजाइश और जटिल हो गई है।
