भारत तेजी से एपिडेमियोलॉजिकल ट्रांजिशन के दौर से गुजर रहा है: डॉ.बी.एस.राजपूत

उत्तर प्रदेश राज्य लखनऊ शहर

लखनऊ, 22 जुलाई 2026। भारत में लाइफस्टाइल डिजीज़ और नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज़ का लगातार बढ़ता बोझ देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों ने इन बीमारियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए प्रिवेंटिव हेल्थकेयर, अर्ली डायग्नोसिस, मल्टीडिसिप्लिनरी ट्रीटमेंट तथा एविडेंस-बेस्ड रिजेनरेटिव मेडिसिन एवं सेल्युलर थेरपी की आवश्यकता पर बल दिया।
इन्हीं विषयों पर सोशल एंड इकोनॉमिक सस्टेनेबिलिटी रिसर्च फाउंडेशन अनुसंधान एवं ज्ञान मंच के संयुक्त तत्वावधान में आज होटल फॉर्च्यून बीबीडी में आयोजित स्पार्क हेल्थ डायलॉग में देश के वरिष्ठ चिकित्सक और स्टेम सेल शोधकर्ता डॉ बी एस राजपूत ने दीर्घकालिक बीमारियों और मरीजों की देखभाल में एडवांस्ड थैरेपीज़ की संभावित भूमिका पर गंभीर चर्चा की।
डॉ. बी.एस. राजपूत वरिष्ठ चिकित्सक, स्टेम सेल थेरेपी, सेलुलर थेरेपी विशेषज्ञ एवं रिजेनरेटिव मेडिसिन ने कहा कि भारत तेजी से एपिडेमियोलॉजिकल ट्रांजिशन के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि अब संक्रामक रोगों की तुलना में क्रॉनिक डिजीज़, डिजेनरेटिव डिजीज़ और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए अधिक बड़ी चुनौती बन रही हैं।उन्होंने कहा कि अर्बनाइजेशन सेडेंटरी लाइफस्टाइल, बढ़ता मोटापा, असंतुलित खान-पान और औसत आयु में वृद्धि जैसी परिस्थितियां देश में क्रॉनिक बीमारियों के मामलों में तेजी से वृद्धि कर रही हैं।
डॉ. राजपूत ने नी ऑस्टियोआर्थराइटिस और अन्य डिजेनरेटिव मस्कुलोस्केलेटल डिस्ऑर्डर पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि भारत में करीब 18 करोड़ लोग विभिन्न प्रकार के आर्थराइटिस से प्रभावित हैं। वहीं 30 से 50 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 15 प्रतिशत वयस्कों में नी ऑस्टियो आर्थराइटिस के लक्षण दिखाई देते हैं, जबकि 50 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में इसकी व्यापकता लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
न्यूरोलॉजिकल रीहैबिलिटेशन पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत में प्रतिवर्ष 1.5 से 2 लाख नए स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के मामले सामने आते हैं, जिनमें लगभग आधे सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े होते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सड़क दुर्घटनाओं, कृषि कार्यों से होने वाली चोटों तथा समय पर ट्रॉमा केयरकी सीमित उपलब्धता के कारण दीर्घकालिक पुनर्वास सेवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है।उन्होंने ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी तथा एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस जैसी दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का भी उल्लेख किया।स्टेम सेल थेरेपी, सेलुलर थेरेपी और रिजेनरेटिव मेडिसिन पर चर्चा करते हुए डॉ. राजपूत ने स्पष्ट किया कि ये उभरती हुई चिकित्सा पद्धतियां पारंपरिक उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि चयनित मरीजों के लिए एक अतिरिक्त चिकित्सीय विकल्प हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में नी ऑस्टियो आर्थराइटिस, स्पोर्ट्स इंजरी, कार्टिलेज रिजेनरेशन, टेंडन एवं लिगामेंट रिपेयर, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी, डायबिटिक वाउंड हीलिंग तथा कुछ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स में इन उपचारों का क्लीनिकल मूल्यांकन किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि स्टेम सेल थेरेपी और सेलुलर थेरेपी बायोमेडिकल साइंस के तेजी से विकसित होते क्षेत्र हैं, जिनमें उपचार की व्यापक संभावनाएं हैं। लेकिन इनका उपयोग हमेशा मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण, नैतिक मानकों, नियामकीय निगरानी और मरीजों के सावधानीपूर्वक चयन के आधार पर ही किया जाना चाहिए।कार्यक्रम के समापन पर सोशल एंड इकोनॉमिक सस्टेनेबिलिटी रिसर्च फाउंडेशन अनुसंधान के प्रोग्राम डायरेक्टर राकेश मिश्र ने कहा स्पार्क हेल्थ डायलॉग का उद्देश्य चिकित्सकों, बायोमेडिकल शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, स्वास्थ्य संचार विशेषज्ञों और समाज के बीच एक सशक्त एवं विश्वसनीय संवाद का मंच तैयार करना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *