ताइवान के विपक्षी नेता को बुलाकर चीन कर रहा खेल, बिना जंग लड़े ही जीत जाएंगे जिनपिंग?

विदेश

नई दिल्ली : बीजिंग में हुई जिनपिंग और ताइवानी विपक्षी नेता की अहम मुलाकात ने एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान की विपक्षी पार्टी कुओमितांग (KMT) की नेता चेंग ली-वुन से मुलाकात की है. इस बैठक के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या चीन अब ताइवान को बिना जंग के अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है?

यह मुलाकात कई मायनों में खास मानी जा रही है, क्योंकि पिछले एक दशक में पहली बार ताइवान की किसी प्रमुख विपक्षी नेता ने चीन का दौरा किया है. बीजिंग में बातचीत के दौरान जिनपिंग ने साफ कहा, “दोनों तरफ के लोग एक होंगे, यह इतिहास की अनिवार्य दिशा है. हमें इस पर पूरा भरोसा है.” उनका यह बयान सीधे तौर पर चीन के उस लंबे रुख को दोहराता है, जिसमें वह ताइवान को अपना हिस्सा मानता है.

चीन लंबे समय से कहता आया है कि ताइवान एक दिन उसके साथ जुड़ जाएगा, ये काम चाहे शांति से या जरूरत पड़ी तो सैन्य ताकत से. लेकिन इस बार जिस तरह से विपक्षी नेता को आमंत्रित किया गया, उसने इस रणनीति को नया मोड़ दे दिया है. इसे “सॉफ्ट पावर” या राजनीतिक प्रभाव के जरिए ताइवान को करीब लाने की कोशिश माना जा रहा है.

ताइवानी विपक्षी नेता ने की शांति की बात

दूसरी तरफ, चेंग ली-वुन ने भी बातचीत में शांति की बात कही. उन्होंने कहा, “ताइवान स्ट्रेट अब टकराव का केंद्र नहीं होना चाहिए. दोनों पक्षों को राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर ऐसा समाधान खोजना चाहिए जिससे युद्ध टाला जा सके.” उनका यह बयान ताइवान में चल रही उस बहस को और तेज करता है, जिसमें कुछ लोग चीन के साथ रिश्ते सुधारने के पक्ष में हैं.

हालांकि, ताइवान की सत्तारूढ़ पार्टी और वर्तमान राष्ट्रपति लाई चिंग-ते इस पूरी प्रक्रिया को शक की नजर से देख रहे हैं. उन्होंने साफ कहा, “चीन लगातार सैन्य दबाव बना रहा है और यह क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है.” उनका आरोप है कि चीन “ग्रे-जोन” रणनीति के तहत दबाव बनाकर ताइवान को झुकाने की कोशिश कर रहा है.

ताइवान के आसपास चीन ने बढ़ाई सैन्य गतिविधियां

पिछले कुछ सालों में चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियां काफी बढ़ा दी हैं. फाइटर जेट्स, युद्धपोत और बड़े सैन्य अभ्यास लगभग रोजमर्रा का हिस्सा बन चुके हैं. यही वजह है कि इस मुलाकात को सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक चाल के तौर पर देखा जा रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अब दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है. एक तरफ सैन्य दबाव और दूसरी तरफ राजनीतिक संवाद. अगर यह रणनीति सफल होती है, तो चीन बिना जंग के ही ताइवान पर प्रभाव बढ़ा सकता है. फिलहाल, यह साफ है कि बीजिंग की यह पहल सिर्फ एक मुलाकात नहीं,बल्कि एक बड़ा संकेत है. आने वाले समय में यह तय करेगा कि ताइवान का भविष्य युद्ध से तय होगा या बातचीत से.

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