समुद्र में ताकत बढ़ाएगा भारत, ₹83000 करोड़ खर्च करके ₹6.25 लाख करोड़ बचाएगा, इस तरह हो रहा है काम

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नई दिल्ली : भारत ने समुद्री ताकत बढ़ाने और तेल आपूर्ति की निर्भरता कम करने के लिए एक बड़ी पहल की है. सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत 2040 तक 112 तेल टैंकर बनाने का फैसला किया है. इस योजना पर करीब 10 अरब डॉलर (करीब ₹83,000 करोड़) का निवेश होगा. इससे न सिर्फ भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि देश में शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री को भी नया जीवन मिलेगा.

फिलहाल भारत अपनी 85% से ज्यादा कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है और लगभग सभी तेल विदेशी जहाजों पर लाया जाता है. इससे देश को हर साल लगभग $75 अरब (₹6.25 लाख करोड़) का खर्च उठाना पड़ता है. इस खर्च को कम करने के लिए अब भारत अपने खुद के टैंकर बनाएगा और उन्हें इस्तेमाल में लाएगा.

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, 2047 तक देश की टैंकर क्षमता को 5% से बढ़ाकर 69% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है. आने वाले वर्षों में भारत की तेल रिफाइनिंग क्षमता 2030 तक 450 मिलियन टन तक बढ़ने वाली है, जिससे तेल परिवहन की मांग भी दोगुनी हो जाएगी.

यह योजना सिर्फ शिपिंग तक सीमित नहीं है, इसका बड़ा आर्थिक प्रभाव भी होगा. इससे करीब 1.5 से 2 लाख तक कुशल नौकरियां पैदा होंगी, और स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स और समुद्री उपकरण जैसे सेक्टर्स में ₹2-3 लाख करोड़ का कारोबार आएगा. गुजरात और तमिलनाडु जैसे कोस्टल राज्यों में मौजूद शिपयार्ड पहले ही इस अवसर को लेकर उत्साहित हैं. भारत इस प्रोजेक्ट में जापान की NYK Line और साउथ कोरिया की HD Hyundai जैसी वैश्विक कंपनियों की तकनीकी मदद ले रहा है, जिससे कोचीन शिपयार्ड जैसे भारतीय प्लांट्स की क्षमता भी बढ़ेगी.

हालांकि यह राह पूरी तरह आसान नहीं है. भारतीय टैंकर विदेशी विकल्पों की तुलना में 15-25% महंगे हैं और अभी भी कई महत्वपूर्ण पुर्जे जैसे मरीन स्टील और इंजन विदेशों से मंगाए जाते हैं. इससे रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ सकती है. लेकिन सरकार इसके लिए टैक्स छूट, फ्रेट सब्सिडी और लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट जैसी योजनाएं ला रही है ताकि कंपनियों को प्रोत्साहन मिले. यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भारत को न केवल आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि हिंद महासागर में देश की सामरिक मौजूदगी को भी मजबूत करेगा. जैसा एक शिपयार्ड कर्मचारी ने कहा, “हर टैंकर जो हम बनाएंगे, वो भारत को थोड़ा और मजबूत करेगा.”

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