सुनील बत्ता: भारतीय सिनेमा में एक प्रसिद्ध व्यक्ति होने के साथ साथ वह एक बहुमुखी फिल्म निर्माता हैं जिनका योगदान निर्देशन, निर्माण, पटकथा लेखन और छायांकन तक फैला हुआ है। 12 जून, 1961 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में जन्में सुनील बत्ता जी ने अपना जीवन कहानियों को सिल्वर स्क्रीन पर जीवंत करने के लिए समर्पित कर दिया है।उनके पोर्टफोलियो में दूरदर्शन के नेटवर्क पर विभिन्न भाषाओं में प्रसारित राष्ट्रीय एकता, साहित्य, संस्कृति और इतिहास के विषयों की खोज करने वाली कई टेलीविजन श्रृंखलाएं, वृत्तचित्र और टेलीविजन फिल्में शामिल हैं। विशेष रूप से, उन्होंने हिंदी-अवधी फीचर फिल्म “अम्मा” के निर्देशक-निर्माता के रूप में काम किया, जिसने 2003 में राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रशंसा हासिल की। उनके उल्लेखनीय कार्यों में “प्रेम सरोवर,” “तीन वर्ष,” और “शान- ए – अवध” शामिल हैं। उनके इस योगदान को मुनाल सम्मान और शान-ए-अवध जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से मान्यता मिली है।सुनील बत्ता के उद्धरण:जिसमें सुनील बत्ता जी ने बताया की “मैं कहीं जाता था ट्रेन से तो मैं पहले कोई बुक लेता था फिर कहीं टिकट लेता था”उन्हें हिंदी साहित्य में इतनी दिलचस्पी थी कि उन्होंने “प्रेमचंद की 15 कहानियाँ बनाईं औरअभी भी बहुत सारे विषय हैं जिनमें उन्हें काम करना है”उन्होंने अपनी फिल्म निर्माण यात्रा की बारे मे भी बताया “ जब मैंने इंटर किया तो इंटर के बाद एडमिशन नहीं हुआ। साल भर खाली थे। दूरदर्शन देखते थे, उसका शौक था। उसे देख के ये हुआ कि मुझे लगा कि ये कमी लगी और पेन उठा ली और फिर वही से रुचि बढ़ी”उन्होंने बताया कि जब वो 6 साल के थे तब उन्हें पहला फिल्ममेकिंग का प्रोजेक्ट मिला । मेरे पिता को फोटोग्राफी का बहुत शौक था। उनकी अलमारी में एल्बम में ढीली तस्वीरें देखीं। और मैंने स्टिक करके तस्वीरें बनाईं। और वो बहुत खुश हुए। तब उन्होंने कहा कि इसने ‘फिल्म’ बनाई। वो मेरी पहली फिल्म थी. वैसे तो मैंने डिपार्टमेंटल और डॉक्युमेंट्री फिल्में बनाईं हैं। 1988 में मुख्य “फेस इन द क्राउड” करके पहली डॉक्यूमेंट्री बनाई दूरदर्शन के साथ ।”मैं झूठ कभी नहीं बोलता। बचपन की कहानी है कि क्योंकि जब मैं 2 क्लास में था तो हिंदी का एक चैप्टर मैंने याद किया था। इस कहानी में “सच मैं बहुत ताकत होती है”। सच कभी याद नहीं रखना पड़ता, झूठ हमेशा याद रखना पड़ता है कि किसको बताया है।”“एक मंडी में दुकान खोलना आसान है। एक मोहल्ले में दुकान खोलना मुश्किल है। जीवन बहुत छोटा है, हमें आप जितना काम चाहिए…चाहे मुंबई मैं या लखनऊ मैं, मुश्किल तो रहती है जिंदगी में। “अगर आपको दूसरी सीधी चढ़नी है तो आपको पहली सीधी से पैर हटाना पड़ेगा इसमें रिस्क है, आप गिर भी सकते हैं। मैंने भी रिस्क लिया और 1992 का मुख्य सीरियल बनाया जो यहां लखनऊ मैं ज्यादा चला नहीं। ये आता है केवल चुनौतियाँ ही मुख्य हैं।”“मैंने लखनऊ कभी नहीं छोड़ा और कभी नहीं सोचा मुंबई जाने का क्योंकि मुझे दूरदर्शन से बहुत अच्छा कनेक्शन था, हर दूरदर्शन से, लखनऊ दूरदर्शन, लेह दूरदर्शन…..से काम मिलता रहता था। इस एपिसोड को लखनऊ बाइस्कोप के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर कभी भी देखा जा सकता है।
