
अंबेडकर जयंती पर सभी दल दलित वोट बैंक की मदद करने में लगे हैं।
अंबेडकर जयंती: अगर भाजपा इस दिन सद्भाव दिवस मनाने जा रही है, तो समाजवादी पार्टी दलित दिवाली के साथ-साथ बाबा साहेब वाहिनी भी मनाने जा रही है।
लखनऊ। पंचायत चुनाव और आगामी यूपी चुनाव के मद्देनजर 14 अप्रैल को बाबासाहेब की जयंती (अम्बेडकर जयंती) पर सभी राजनीतिक दलों का कार्यालय अंबेडकरमय दिखेगा। अगर भाजपा इस दिन सद्भाव दिवस मनाने जा रही है, तो समाजवादी पार्टी दलित दिवाली के साथ-साथ बाबा साहेब वाहिनी भी मनाने जा रही है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी की राजनीति बाबासाहेब के इर्द-गिर्द घूमती है। कांग्रेस के लिए भी महत्वपूर्ण है। वही वामपंथी भी उस दिन को संविधान रक्षा दिवस के रूप में मना रहे हैं।
दरअसल, कारण स्पष्ट है। क्षेत्र 21 से 22 प्रतिशत दलित वोट बैंक है, जिस पर बहुजन समाज पार्टी का शासन था। पिछले लोकसभा चुनाव में लगभग 75 प्रतिशत जाटवों ने सपा-बसपा और रालोद गठबंधन को वोट दिया था, लेकिन गैर-जाटव दलितों में से केवल 42 प्रतिशत ने ही उन्हें वोट दिया था। गैर-जाटव दलित मतदाताओं में से, 48 प्रतिशत ने भाजपा उम्मीदवारों को चुना। यह समीकरण राजनीतिक दलों को अपनी ओर खींच रहा है। जाटव को छोड़कर अन्य दलित जातियां भाजपा और कांग्रेस के निशाने पर हैं। यही वजह है कि सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निशाने पर कांग्रेस और भाजपा भी हैं।
सभी पार्टियों के अपने-अपने दावे हैं
अखिलेश यादव ने बाबा साहेब वाहिनी बनाने की घोषणा की है। दूसरी ओर, अंबेडकर जयंती को सद्भाव दिवस के रूप में मनाने पर, भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष विजय बहादुर पाठक का कहना है कि कुछ राजनीतिक दल हैं जो वोटों के लिए यह सब करते हैं। भाजपा सभी के विकास के लिए काम करती है और इसी के तहत हर जाति धर्म के लोगों तक पहुंचती है। दूसरी ओर, राम मंदिर आंदोलन से जुड़े दलित कामेश्वर चौपाल को राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है, जो भाजपा और आरएसएस की रणनीति का हिस्सा है। वहीं, कभी दलित वोटों पर राज करने वाली कांग्रेस भी अंबेडकर को अपनाने में पीछे नहीं है। कांग्रेस प्रवक्ता अशोक सिंह का कहना है कि चुनाव को देखते हुए, अन्य राजनीतिक दल अम्बेडकर और दलित को याद कर रहे हैं, जबकि सबसे अधिक अत्याचार इन दलों के शासन में हुआ होगा।दलित वोट बैंक क्यों महत्वपूर्ण हो गया
अभी दलित आंदोलन का ठहराव और विघटन हो रहा है, क्योंकि यूपी में अनुसूचित जातियों की श्रेणी में केवल जाटव और चमार ही सामाजिक न्याय के नेता बन रहे हैं। उसके वर्ग की अन्य जातियाँ जैसे पासी, कोरी, धोबी, खटिक, बाल्मीकि आदि को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दलित नेताओं के लिए नए घर बन गए। जैसे कौशल किशोर, स्वामी प्रसाद मौर्य, लालजी निर्मल, जुगल किशोर डॉ। उदित राज, पीएल पुनिया, आरके चौधरी, अशोक डोहरा, राकेश सचान आदि। सपा के बाबा साहब वाहिनी का निर्माण भी इसी रणनीति का हिस्सा है। क्योंकि चंद्रशेखर का दलित राजनीति में प्रवेश यह बताने के लिए पर्याप्त है कि बसपा का दलित वोट बैंक बिखर रहा है, जिसे अन्य राजनीतिक दल अंबेडकर के बहाने बचाने की कोशिश कर रहे हैं।